Thursday, 17 December 2015

वफा

" तुम अब भी मेरा पीछा क्यों नहीं छोड़ती ? मेरी ज़िन्दगी से जब तुम चली ही गई हो तो क्यों बार - बार मेरे सामने आकर मुझे तड़पाती हो , क्यों बीते दिनों की याद दिलाती हो ? ओह ! यह आँखे , इनकी रोशनी चली क्यों नहीं जाती ? " 
प्रकाश ने शराब के गिलास को अपने होंठो से लगाने के लिये उठाया ही था कि तभी उसे जाह्नवी की आवाज अपने कानों में पड़ती हुई सुनाई दी । " कैसे छोड़ सकती हूँ तुम्हें मैं आज भी तुम्हें उतना ही प्यार करती हूँ जितना पहले करती थी । " झूठ झूठ सब धोखा है अगर तुम मुझसे प्रेम करती तो इस तरह तुम मुझे यूँ अकेला छोड़ कर ना जाती नशे के घूँट को अंदर गटकते हुए वह बुदबुदाया । एक बार जरा अपनी हालत तो देखो तुम यह बड़ी हुई दाढ़ी , लम्बे बिखरे हुए बाल , शरीर से आती हुई सड़ांध तुम तो कभी ऐसे ना थे । बन्द करो अपना प्रवचन देना, चली जाओ यहाँ से मुझे तुम्हारी शक्ल से नफरत हो गई है कहते हुए उसने गिलास उठाया और उसकी ओर फेंक दिया , पल भर के लिये उसका चेहरा उसकी नजरों से ओझल हो गया पर अगले ही पल जमीन पर बिखरे पड़े कांच के टुकड़ो पर प्रेयसी का चन्द्रमुखी मुखड़ा हर ओर उसकी उपस्थिति को दर्ज करा रहा था । यह मेरे किस गुनाह की सजा तुम मुझे  दे रही हो कहते हुए लड़खड़ाते हुए क़दमों से बोतल को हाथ में लिये उसने मयखाने से बाहर निकलने की एक नाकाम कोशिश की पर वह अपने को सम्भाल नहीं पाया और जमीन पर गिर गया , कांच के बिखरे टुकड़ो पर अंकित अपनी प्रेमिका के चेहरों को वह चूमने की नाकाम कोशिश करने लगा , काश ! वह मनहूस दिन हमारी ज़िन्दगी में ना आता और हम सदा एक दूसरों की बाहों में रहते , आज मुझे ऐसा क्यों लग रहा है कि तुम्हारी दी हुई आँखें मेरे लिये अभिशाप बन गई है ।
मैंने तुम्हें कहाँ छोड़ा प्रकाश , मैं आज भी तुम्हारे पास हूँ एक बार इस नरक के दलदल से बाहर निकल कर तो देखो , मैं तुम्हारी थी और तुम्हारी ही रहूँगी , तुम्हें मेरी कसम अगर  फिर से इसको हाथ लगाया तो मैं सदा के लिये तुम्हारा साथ  छोड़ कर चली जाओगी । बेसुध प्रकाश के मुँह से एक कराह सी उठी " मत जाओ इस बार मैं तुम्हारे बिना जी नहीं सकता शराब क्या मैं तुम्हारे लिये यह दुनिया भी छोड़ सकता हूँ । " जमीन पर बिखरी शराब की बोतल के कांच के टुकड़ों पर उसका मुस्कराता चेहरा वह स्पष्ट देख सकता था ।

( पंकज जोशी ) सर्वाधिकार सुरक्षित ।
लखनऊ । उ०प्र
१७/१२/२०१५

Sunday, 29 November 2015

नशा उन्मूलन

मुरारी बाबू के शव को प्रणाम कर उनके बचपन के मित्र सोमेश उनकी धर्मपत्नी को सांत्वना देने पहुंचे " अरे भाभी जी यह सब अचानक कैसे हो गया? क्या कहें भाईसाहब कल रात ये खाना खाने के बाद सोने जा रहे थे कि अचानक से इनके सीने में दर्द उठा ----और बस । यह सचमुच आप लोंगों के साथ बुरा हुआ परमतम आप लोगों को इस असमय दुःख को सहने की ––– " सोमेश जब तक अपने शब्दों को विराम देते तब तक पास में बैठा मुरारी बाबू का सुपुत्र रवि यह सब सुन कर अपनी भावनाओं को काबू में ना रख पाया और जोर से फूट फूट कर रोने लगा " यह सब मेरे कारण हुआ है माँ ! ना मैं कल रात नशे की हालत में घर आता और ना ही बाबू जी इस तरह बिना इलाज के तड़पते हुए प्राण छोड़ते " सुमित्रा उसके पास आकर उसके सिर पर हाथ फेरते हुए बोली " यह सब तो विधि का विधान है , इसमें तेरा क्या दोष । हाँ , अगर तुम अपने अंदर की पश्चाताप की आग में जल रहे हो तो बेटा अपने पिता के सामने प्रण लेना होगा कि आज कि आज के बाद तुम ना केवल इस कुरीति का त्याग करोगे बल्कि औरों को भी नशा त्यागने के लिए भी को भी प्रेरित करोगे । यही तुम्हारी उनके प्रति सच्ची श्रद्धाजंलि होगी ।

पंकज जोशी (सर्वाधिकार सुरक्षित )
लखनऊ । उ०प्र०
30/11/2015

Wednesday, 4 November 2015

अपराधी कौन

" श्याम तेरी आज रिहाई है । जैसा तू यहाँ अच्छा बन के रहा तू ऐसा ही बाहर भी  बन के रहना और देख अब कोई लफड़ा नहीं मांगता। " 

बाल सुधार गृह संचालक ने उसकी ओर मुखातिब हो कर कहा ।

आज तीन बरस बाद उसकी रिहाई थी । अपनी बहन को छेड़ने वाले लड़के को हॉकी से मार मार कर अधमरा कर मार डाला था । 

इतने दिनों तक वह ज़िंदा है कि मर गया परिवार जनों में से किसी ने भी उसकी सुध नहीं ली थी । आज उसे कोई लेने तक नहीं आया था । सीधा माँ-बाप से मिलने घर की ओर चल पड़ा ।

मोहल्ले में कदम रखते ही रहमान चाचा चिल्ला पड़े " अरे अपने अपने बच्चो को सम्भालना जरा हत्यारा जेल से छूट कर आ गया है कहीं कोई जरा सी बात हुई नहीं कि किसी का फिर से कत्ल पता चला हो जाय । " 

" चाचा यह क्या बोल रहे हो आप ? मैंने कोई जानबूझ कर मारा था उसे । अपनी बहन की रक्षा की थी उससे " अपना पक्ष रखते हुए बोला ।

" चुप ****** बदजात अपनी औकात में रह । हरामी कहीं का । चल फुट यहाँ से नहीं तो पुलिस के हत्थे चढ़वा दूंगा । "

आँखों से उसकी आंसू की एक धारा बह चली थी । घर पहुँच कर उसने कुण्डी खटका ही थी कि सामने उसने अपनी बहन को खड़ा पाया । " तुम यहां ? क्यों क्या हुआ ? " जब तक वह कुछ पूछता तब तक सीमा एक साँस में ही सब कुछ बोल गई । " तुम्हारी यहाँ कोई  जरूरत नहीं मेरी अगले हफ्ते शादी है और तुम्हारे जैसे हत्यारे की बहन होने से अच्छा है मैं बिना भाई के ही रहूँ। और मेरे ससुराल वाले भी तुम्हारे बारे में कुछ नहीं जानते है । मैं अपने माँ बाप की इकलौती औलाद हूँ उन्हें बस इतना ही पता है । पर यह सब तो सीमा मैंने तुम्हारे लिए किया था । " 

उसने मेरा सिर्फ हाथ पकड़ा था कोई मेरा बलात्कार नहीं - जो तुमने उसे बेरहमी से मार डाला । अब आज के बाद मुझे अपनी शक्ल ना दिखाना । "

आज वह एक बार फिर  कोर्ट में जज के सामने खड़ा था लेकिन इस बार उसका सिर नीचा नही गर्व के साथ ऊँचा था । 

पंकज जोशी 
लखनऊ । उ०प्र०
०४/११/२०१५

Tuesday, 3 November 2015

व्यथा -1

" ओ हरिया जरा सुन तो ?" क्या बात है काका जय राम जी की ! "

" जय राम जी की बचवा ! शहर से कब आये तुम " बस कल ही आया चाचा तुम सुनाओ घर में कुशल मंगल है चाची जी कैसी है ? रामू कैसा है ? "

 "अब क्या बताये बच्चा घर की बात घर तक ही रहे तो अच्छी रहती है पर तुम भी तो पराये कहाँ ठहरे । रामू पिछले बरस वह सुखिया की जोरू के संग शहर भाग गया है । और तेरी चाची को उसी के गम में फालिज मार बैठा । "

 " पर वह तो उम्र में उससे बड़ी थी ना चाचा ? "  " हाँ बड़ी तो थी बेटा " । ओह फिर तो यह बहुत बुरा हुआ चाचा तुम्हारे परिवार के साथ । " 

" अरे कीड़े पड़े नासपीटी उस कलमुहीं के जो मेरे बुढापे का सहारा छीन मुझसे छीन लिया ।"

 " देखो चाचा यहां तुम गलत बात कर रहे हो अब इसमे उस बेचारी औरत का क्या दोष । अब तुम्हारा सुखिया कोई कम है , यह तो पूरा गांव जानता है उसके लक्षण के बारे में। दिन भर नशे में चूर और रात भर उसके घर में आने जाने वाले  लोंगो का ताँता लगता था । आखिर वह भी एक इंसान थी कोई पत्थर की मूरत नहीं उसको भी इस दलदल से छुटकारा चाहिए था । तो जरिया तेरा लड़का बना । अच्छा अब मैं चलता हूँ राम राम । "

( पंकज जोशी ) सर्वाधिकार सुरक्षित ।
लखनऊ । उ०प्र०
०२/११/२०१५

Monday, 2 November 2015

व्यथा

" ओ हरिया जरा सुन तो ?" क्या बात है काका जय राम जी की !" जय राम जी की बचवा ! शहर से कब आये तुम " बस कल ही आया चाचा तुम सुनाओ घर में कुशल मंगल है चाची जी कैसी है ?रामू कैसा है ? क्या बताये बच्चा घर की बात घर तक ही रहे तो अच्छी रहती है पर तुम भी तो पराये कहाँ ठहरे । रामू पिछले बरस वह सुखिया की जोरू के संग शहर भाग गया है । और तुम्हारी चाची को उसी के गम में फालिज मार बैठा । " पर वह तो उम्र में उससे बड़ी है चाचा । " अब क्या बात क्या क्या अरमान संजोये थे बेटे की शादी को लेकर ऊपर से तेरी बहन के ससुराल वालों को उचित दहेज़ ना दे सका तो उसे पेट से है जानकार उसे यहां पटक गये । नासपीटी अपना घर छोड़ कर मेरी छाती में मूंग दल रही है। अब मैं अकेला इस  बुढ़ापे में घर बार चूल्हा चौक्का करूँ या खेतों में अनाज बोऊं । साहूकार ने जो रुपया उधार दिया था खेती के लिये पर बिन मौसम बरसात उसे ले डूबी । उसकी नजर मेरे खेत में हैं  मेरा जीवन तो जैसे अर्थहीन हो गया है । इस पार नदी तो उस पर खाई । अरे तुमको भी कहाँ लपेट लिया अपने चक्कर में कभी मौका मिले तो शहर में अपने भाई को जरा समझाना कि घर लौट आये । अच्छा अब मैं चलता हूँ। राम राम।"

( पंकज जोशी ) सर्वाधिकार सुरक्षित ।
लखनऊ । उ०प्र०
०२/११/२०१५

Thursday, 29 October 2015

शह और मात

" ताऊ ! इस शतरंज के खेल में इक बात मुझे आज तक समझ में ना आई ? " " क्या हुआ भतीजे तुझे मेरी चालों से डर लगने लगा क्या ? " ताऊ ने खटिया पर बैठे बैठे अपनी घनी मूछों को ताव दिया ।

" नही ऐसी कोई बात नहीं है बस यूँही एक विचार आया कि घोडा ढाई घर चले हैं,ऊंट तिरछा , हाथी सीधा , वजीर चारों ओर तो यह बादशाह अपनी जगह एक खाने से दूसरे खाने क्यों नाचे है?"
" अरे पगला गया है क्या खेल के भी कुछ नियम होते हैं । फिर राजा तो राजा होवे है उसका काम तो सबकी पीठ पीछे युद्ध का संचालन करना है । नेतृत्व बोलें हैं बड़े बुजुर्ग इसको"
" पर ताऊ हमने तो सुना है कि बादशाह लोग तो अपने को युध्द में आगे कर युद्ध में बढ़चढ़ कर हिस्सा लेते थे?"
"वह बीते दिनों की बातें थी बेटा आजकल तो सिर्फ दूर से ही फैसले उल्टा पुल्टा करता है।"
"तो क्या ताऊ तू भी कहीं अपने को बादशाह तो ना समझ बैठा है।"
" कैसी बात कर रहा है तू छोरा ? "
"सच्ची बात कर रहा हूँ क्या तू अपना पाप मेरे गले में ना बाँधना चाहे है। शहर में रहता हूँ तो क्या ? गाँव की हवा मेरे को भी छूती है। ले बचा अपना राजा यह शह और यह मात।"
पसीने से तरबतर ताऊ अंगोछे से अपना मुँह छुपाये बैठा था ।



( पंकज जोशी ) सर्वाधिकार सुरक्षित ।

लखनऊ । उ०प्र०
३०/१०/२०१५

Wednesday, 28 October 2015

वंश - 2

"अरे बधाई हो आपको नानी जी ! परनानी जो बन गईं आप , आज मैं बहुत खुश हूँ । दीपावली में साक्षात लक्ष्मी जी हमारे घर पधारीं हैं । यह लीजिये मुँह मीठा कीजिये । "

निमेष ने जैसे ही मिठाई का डिब्बा खोल मिठाई उनको खिलानी चाही उन्होंने बेरुखी से मुँह फेरते हुए कहा । " आपको पता नहीं दामाद जी ज्यादा मीठा खाने से सुगर बड़ जाती है । और वैसे भी लड़की ही  पैदा हुई है कोई लड़का तो नहीं । अब लक्ष्मी  आयेगी या जायेगी यह तो वक़्त ही बतायेगा । "

( पंकज जोशी )सर्वाधिकार सुरक्षित ।
लखनऊ । उ०प्र०
२९/१०/२०१५

वंश

" अरे भई कोई घर में घी के दिये जलायेगा भी या नहीं  ,  लड्डू मिठाई से मुँह तो मीठा कराओ दामाद जी का  घर में साक्षात लक्ष्मी जी पधारी है । "
" अरे अम्मा जी ! आपको भी बहुत-बहुत बधाई  रातों रात इतना बदलाव कैसे ?  " 
" अरे निमेष जी आप भी ना बातों को पकड़ बैठते है । जमाना बदल गया है अब वंश लड़को से नहीं लड़कियों से चलेगा मैं कहे देती हूँ हाँ नहीं तो । "

( पंकज जोशी ) सर्वाधिकार सुरक्षित ।
लखनऊ । उ०प्र०
२८/१०/२०१५

Monday, 19 October 2015

सच्चा व्रत

मंदिर में स्वामी जी का प्रवचन चल रहा था । 
" मनुष्य का अपनी वृतियों पर नियंत्रण ही सच्चा व्रत है । "
इन चंद शब्दों ने उसके अंतर्मन को बींध कर रख दिया । अब वह पहले जैसा नही रहा था । 

मार्ग के पथरीले पत्थर उसका इन्तेजार कर है ।

( पंकज जोशी )सर्वाधिकार सुरक्षित ।
लखनऊ । उ०प्र०
१९/१०/२०१५

माँ

" अरे  पकड़ो पकड़ो , पकड़ो  उस चोर को  ! बस रोको भई । अरे मेरी पत्नी हस्पताल में भर्ती है उसकी दवाई लानी है । अरे कोई तो पकड़ो उसे।"

 तभी एक व्यक्ति छोटे से बच्चे को घसीटता हुआ लाता है । 

 " भाईसाहब  यह लो आपका मुजरिम " " क्यों बे ! इतनी छोटी सी उम्र में चोरी चकारी क्या यही सिखाया है तुझे तेरे  माँ बाप ने ? । व्यक्ति ने उसको बालों से खींचतें हुए पूछा 

 " नहीं साब मेरी माँ  " 

" क्या हुआ तेरी माँ को ?
 व्यक्ति ने  बच्चे से भौयें सिकोड़ते  पूछा ।

 " माँ , हस्पताल के बाहर पड़ी है । "

( पंकज जोशी )सर्वाधिकार सुरक्षित ।
लखनऊ । उ०प्र०
१९/१०/२०१५

Saturday, 17 October 2015

अस्तित्व

" क्या बात है सुकन्या तुम्हारी आँखों में आँसू क्या तुम मेरे साथ गाँव में खुश नहीं हो ? " 
" नहीं ऐसी कोई बात नहीं है बस यह कमबख्त कब निकल आये पता ही नहीं चला । बीते दिनों  की याद चली आई । अब तो बरसों बीत गए इस बात को ।  मैं तुम्हारा अहसान कैसे भूल सकती हूँ रवि ! , अगर उस  रात तुम ना होते तो मैं समाज को क्या मुँह दिखाती ? "

" इसमें अहसान कैसा पगली तुम तो मुझे सैदेव ही पसन्द थी। लेकिन जो भूल मुझसे हुई रंगमंच की अदाकारा को घर में बाँधने की उसका प्रायश्चित मैं करके रहूँगा । हम कल ही शहर चलेंगे । तुम्हारे नाम पर पड़ी धूल की परत हटाने । "

( पंकज जोशी ) सर्वाधिकार सुरक्षित ।
लखनऊ । उ०प्र०
१७/१०/२०१५

डर

" अरे वाह ! देखो तो सही श्रीमती जी आज की लड़कियों के चेहरों  को , आत्मविश्वाश से भरपूर देश की रक्षा के लिये कुछ भी कर गुजरने को तैय्यार हैं । " समाचार पत्र में छपे चित्र को दिखाते हुए शर्मा जी बोले ।
तभी पीछे से प्रीति की आवाज सुनाई पड़ी " माँ ! शाम को कालेज से आने में जरा देर हो जायेगी फेयरवेल पार्टी है ।
 " कोई जरूरत नहीं फेयरवेल पार्टी में जाने की क्लास खत्म होने के बाद सीधा घर आना समझी !  " पर बाबू जी फेयर वेल पार्टी तो हम लोंगो के लिये है और अभी आप ही तो कह रहे थे आज कल की लड़कियाँ आत्मविश्वाश से भरी हुई हैं " 
" पेपर में जो कुछ भी छपता है वह सब सच नहीं होता समझी " आँखें तरेरते हुए शर्मा जी बोले ।

(पंकज जोशी) सर्वाधिकार सुरक्षित ।
लखनऊ । उ०प्र०
१७/१०/२०१५

Wednesday, 14 October 2015

स्वत्व


" क्यूँ री तेरे खान पान रहन सहन में क्या कमी रखी जो तू हमें ही आँखे दिखा रही है । " 

" तूने कोई कसर नहीं छोड़ी मौसी पर मैं आँखें बंद कर उस लड़के को हाँ भी नहीं कह सकती । ऐसे व्यक्ति से जिसका अपना कोई अस्तित्व ना हो  मैं उसके साथ ज़िन्दगी कैसे गुज़ार दूँ ? तुम्ही बताओ ?

" ऐसा ना हो कि तुझे कल पछताना पड़े ।  " " पछताना कैसा मौसी क्या समाज के लिये स्वयं की बलि चढ़ा दूँ ? बगैर स्वत्व का भान किये ? "

( पंकज जोशी ) सर्वाधिकार सुरक्षित ।
लखनऊ । उ०प्र०
१४/ 10 / २०१५

Tuesday, 13 October 2015

अहं

" सुनो जी आज से अपने भैय्या से कह देना कि मुझसे रौब से खाना पीना मत माँगा करें ।  मेरी शादी तुम्हारे संग हुई है तुम्हारे घर वालों के साथ नहीं ! " 

 " पर उमा मैं यह कह सकता हूँ भाभी को गये अभी महीना भर नहीं हुआ है ऊपर से बिट्टू भी तो छोटा ही है क्यों  तुम बच्चे को स्वयं अपना लेती । "

" मैंने दुनिया जहाँ का ठेका नहीं ले रखा सोमेश कल मैं अपने माँ के घर चली जाऊँगी जब तुम्हारे भैय्या का इंतजाम हो जाये तो मुझे बुला लेना " 

पर ऐसी निष्ठुर तुम कैसी हो सकती हो तुम भी तो एक स्त्री हो । 

तभी उन्हें पीछे से बड़े भैय्या की आवाज सुनाई पड़ी - बहू ! तुम्हें कहीं जाने की जरूरत नहीं मैं कोई ना कोई इंतेजाम कर लूँगा भाग्य की मार के आगे तुम्हारे वचन फिर भी अच्छे हैं ।

( पंकज जोशी )सर्वाधिकार सुरक्षित ।
लखनऊ । उ०प्र०
13/10/2015

Thursday, 8 October 2015

किट्टी पार्टी

"मिसेज दीक्षित मैंने सुना है कि आप चुनाव लड़ रही हैं ? "  " सुना क्या मतलब जमुना पार का टिकट मुझे  मिला है मिसेज श्रीवास्तव । " अपने गले का हार ठीक करते हुए बोलीं ।


" पर आप कब से समाज सेविका बन गईं अरुणा जी ! " वोदका का शॉट मारते हुए बोली । 

" अरी मिसेज श्रीवास्तव आपका बचपना कब जायेगा ! क्या समाज सेवा के लिये चुनाव लड़ा जाता है ? गुस्से से मेज पर पत्ते पटकते हुए बोली "ट्रेल है!"


(पंकज जोशी) सर्वाधिकार सुरक्षित ।



लखनऊ । उ०प्र०



०८/१०/२०१५

Monday, 28 September 2015

विधर्मी खून

हैजा का प्रकोप ऐसा फैला  कि  पूरा गांव उसकी चपेट में आ गया । शन्नो ताई भी उससे अछूती ना रही । शन्नो ताई को अफसोस था उस दिन पर जब रमा आई थी जागरूकता के लिये  और उसने , 

" ए रमा ! चल हट यहां से  ! भाग यहां से  नासपीटी फ़ौज को ले कर के ! हमारे कुंए को हाथ भी ना लगाना , हमे कोई दवा-ववा नहीं डलवानी  तेरे से। " 

" पर ताई ! अगर कुँए का पानी साफ़ नहीं किया गया तो गांव में हैजा फैलने का डर है । "

" मुझे सिखाती है करमजली ! शहर जा कर चार अक्षर क्या पढ़ आई  मुझको अंग्रेजी सिखाती है ।  "

" बड़ी आई डाक्टरनी कहीँ की  मुझको अक्ल सिखाने आई है । उस समय तेरी अक्ल किधर चरने चली गई थी जब तूने उस विधर्मी के साथ मुँह काला करके हमारी नाक कटा कर चली गई थी । हमको बुढापे में सिखाएगी जाति पात , धर्म भेद ? "
 "अरे ओ सुखिया दो लठैत बिठा दे इहाँ पर और देखो कउनो हमार पानी ना छुएं । " 
आज उस दिन को याद करते हुए वो आत्मग्लानि की अनुभूति कर रही थी । 

तभी  वार्ड में रमा उनका चेकअप करते हुई बोली  "ताई अब तुम बिलकुल ठीक हो तुम अपने घर जा सकती हो लेकिन तुमको गाँव में अब कौन अपनायेगा ? "  तुम  तो अशुद्ध हो गईं जो खून तुम्हारी रगो में बह रहा है वह तो तुम्हारे विधर्मी दामाद का है । अब तो तुम्हे मेरे साथ ही रहना पड़ेगा। " रमा ने चुटकी लेते हुए कहा ।
" नासपीटी कहीं की मुझसे ठिठोली करती है ! " ताई ने प्यार भरी चपत उसके गाल पर मारते हुए कहा ।

पंकज जोशी  ( सर्वाधिकार सुरक्षित )

लखनऊ । उ०प्र०

28/09/2015

Sunday, 13 September 2015

वक़्त     
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दरवाजे पर घण्टी बजा कर जैसे ही  पार्सल वह अपने झोले से निकालने ही वाला था कि सामने उसने रेखा को खड़ा पाया । उसकी आँखों के सामने बीता कल घूम गया था । अरे यह तो वही पगली है जिसे सारे बच्चे पाठ शाला में चिढ़ाया करते थे ।

" आज यह सेठानी बन गई वाह री तकदीर ।

अनजान  बन चुपचाप उसने विदेश से आया पैकेट  निकाला , कागज में हस्ताक्षर करवा कर वह जैसे ही चलने को हुआ । उसके कानों को इक कोमल आवाज सुनाई पड़ी । " एक मिनट भैय्या जरा रुकिए तो सही मैं अभी आती हूँ !  सेठानी ने हाथ से उसे इशारा करते हुए कहा और अंदर चली गई "

थोड़ी देर में वह हाथ में  एक छोटा सा पैकेट लेकर आई " यह भाभी जी को दे  दीजेगा , और कहियेगा यह उनकी पगली ननद ने भेजा है । 

" आज उसे यह शहर पराया नहीं लग रहा था । "

( पंकज जोशी ) सर्वाधिकार सुरक्षित ।
लखनऊ । उ०प्र०
13/09/2015

Thursday, 3 September 2015

उर्मिला की व्यथा 
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आज राज्य की सड़के सूनी हो पड़ी हैं , तीन सधवायें को अकारण ही वैधव्य को प्राप्त होना पड़ा , अनजाने में किया एक ऐसा प्रण जिसके फलस्वरूप पुत्र विछोह का दंश महाराज सहन ना कर  सके और प्राण त्याग दिये । प्रजा बिना राजा के अनाथ हो गई ।

पर महल के कोने में बैठी उस फूल सी कोमल स्त्री का क्या दोष ? जो उसको सधवा होते हुए भी श्रृंगार रहित हो , भगवा वस्त्र धारण करना पड़ा।

रानी से उसका कुम्हलाया चेहरा देखा ना गया वह उसको गले लगाते हुए बोली " यह तो विधि का विधान है जो टाला नहीं जा सकता "

कांधे में सिर रखी कन्या के सब्र का बाँध टूट चुका था " माँ ! यह कैसी वचनों को निभाने की कुल रीति है  जिसका वनवास मुझे अगले चौदह साल तक एक विधवा की तरह निभाना होगा । "

( पंकज जोशी ) सर्वाधिकार सुरक्षित ।
लखनऊ । उ.प्र
03/09/2015

Friday, 28 August 2015

 " दंड "
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" क्यों चौधरी आज तुझे सांप क्यूँ सूँघा हुआ है, जब तेरे घर से बारात उलटे वापस चली गई ? यही पगड़ी तब क्यों ना उतरी ?  जब तू बरसों पहले श्यामा के घर से बारात वापस ले आया था ! तुझे उसी का श्राप लगा है ।"

अस्पताल के बिस्तर में फालिज की मार खाये चौधरी की आत्मा उसको रह रह कर कचोट रही थी ।

( पंकज जोशी ) सर्वाधिकार सुरक्षित ।
लखनऊ । उ. प्र
29/08/2015

Tuesday, 25 August 2015

स्पर्श 
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" सुनो तुमसे कुछ कहना चाह रही थी । "
 " हाँ पूछो ! " रमन ने किताब के पन्ने उलटते हुए कहा ।
" दरअसल मैं चाहती हूँ कि उमेश  ने शादी हमारी मर्जी से नहीं की पर उस बात को गुजरे कई साल गुजर गए हैं , आज हमारे बेटे को हमारी जरूरत है ! और क्या तुम्हे अपने पोते से आखिरी बार देखना नहीं चाहोगे ? " 
" यह क्या कह रही हो तुम उमा ? " " सच कह रही हूँ , उसको ब्रेन ट्यूमर है , हॉस्पिटल में उसका ऑपरेशन है आज ?"

एक अरसे बाद बाप बेटे का मिलन हो रहा है  आंसूओं से भीगे गाल पिता को आत्म ग्लानि के बोध से मुक्त करा रहे हैं ।

ऑपरेशन थियेटर से बाहर निकलते ही पोते के सिर पर हाथ फेरते हुए बुदबुदाये, "तुझे कुछ नहीं होगा बेटे । "

(पंकज जोशी )
लखनऊ । उ०प्र०
25/08/2015

Monday, 17 August 2015

जेनरेशन गैप 
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" हाय रब्बा आज कल की कुड़ियों को देखो तो सही ! , कैसे - कैसे कपडे पहनती हैं, दिन भर फोन में चिपकी रहती हैं ,  इनके मोबाईल मैसेजेस पढ़ो तो शर्म से आँखे धरती पर गड़ जाये । अभी पड़ोस के शर्माइन की लड़की ने अपनी कमर में दिल वाला टैटू गुदवा रखा है , बड़ी मटकते हुए घूम रही है है पूरे मोह्ल्ले में , अब यह कोई बात हुई !  दिल भी भला कमर में होता है क्या ? आजकल  बच्चो को कोई लाज शर्म रह ही नहीं गई है  । "  

सामने टीवी सीरयल देखती हुई और हाथों से मटर के दाने छीलती हुई राधा अपनी कालेज की सहेली शीला से गप्पें मार रही थी । 

" तो तू क्या कम थी अपने जमाने में , क्या- क्या गुल नहीं खिला रखें हैं तूने । देख मेरा मुँह ना खुलवा ..."

अरे हमारे जमाने और थे और यह ज़माना कुछ और है  , तू तो बिलकुल भोली है । "

कमरे में तान्या प्रवेश करती हुई बोली ! " मम्मा जमाने सब एक होते हैं , बस सोच सही होनी चाहिये "

हाय रब्बा अब यह बच्चे हमें सिखाएंगे .................?

( पंकज जोशी ) सर्वाधिकार सुरक्षित ।
लखनऊ । उ.प्र 
18/08/2015

Friday, 14 August 2015

प्रायश्चित
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अब्दुल्ला ने आतंकवाद का रास्ता छोड़ एक सामान्य नागरिक का जीवन बिताने का फैसला किया । 
आज जुमा है ,  वह नमाज करके जैसे ही उठा तो सामने उसने राशिद को खड़ा पाया । 

" क्या हुआ राशिद ऐसा बदहवास सा क्यों है ? , क्या बात ......... ? " इससे पहले कि वह कुछ बोलता , उसने उसके हाथ में एक पर्ची थमा दी , तेजी से पलटा और वहां से चला गया ।

पंद्रह अगस्त के दिन स्कूल में आतंक वादी हमला ! रह रह कर पर्ची में लिखे शब्द उसे याद आ रहे थे ।

स्कूल में आयोजन की जबरदस्त तैयारी चल रही थी । झंडा रोहण शुरू होने ही वाला था तभी उसने दूर से मानव बम फैजल को चिन्हित कर लिया । 

अब्दुल्ला की पैनी नजर दूर से  उसके ऊपर टिकी थीं ।

जब तक वह मंच तक पहुँचता ,  अब्दुल्ला उस पर भूखे शेर की तरह झपट पड़ा । 

मंच से दूर मैदान पर एक जोरदार धमाका हुआ ।

अब्दुल्ला की शहादत बेकार नहीं गई । सैकड़ो खिलते मासूम चेहरे इस बात के गवाह थे

( पंकज जोशी ) सर्वाधिकार सुरक्षित ।
लखनऊ । उ.प्र 
14/08/2015

Thursday, 13 August 2015

सोशलाइट
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शहर में चारों ओर जाम लगा है टीवी चैनल वाले सीधा प्रसारण कर रहे हैं , व्यस्तम चौराहे पर गाँधी प्रतिमा के नीचे " बाल मजदूरी व शोषण के खिलाफ  धरने पर बैठी महिला उस समय किसी को मुँह दिखाने के काबिल ना रही जब उसी के खिलाफ  बाल मजदूरी व शोषण क़ानून के उल्लन्घन करने पर पुलिस ने उसको गिरफ्तार कर लिया ।
टीवी पर उसके लाइव टेलीकास्ट ने रातों रात उसे मशहूर कर दिया ।

( पंकज जोशी ) सर्वाधिकार सुरक्षित ।
लखनऊ । उ.प्र 
13/08/2015

Monday, 3 August 2015

बेईमान रिश्ते
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मन अपनी अबाध गति से चला जा रहा था , तेज रफ़्तार से उड़ा जा रहा था एक पतंग की तरह सहसा ही पीछे से आवाज आई मेरे छोटे भाई की थी , और मैं तन्द्रा से बाहर निकला ।

" दद्दा हम पतंग उड़ाते है चरखी एक हाथ में लिए ! मैंने कहा हाँ मान लो अगर पतंग की डोर टूट गई  तो क्या करोगे ?  मैंने कहा दुबारा मांझे पर गाँठ लगा दूंगा ? फिर भी ...तो मैंने कहा जितनी बार टूटेगी उतनी बार बांधूंगा । उसके बाद ? उसने पूछा ! मैं नई डोर ले आऊंगा !

तो क्या आप को नहीं लगता कि ज़िन्दगी में हम जितनी बार लड़ते हैं तो मन में गाँठ बनती जाती है ? ऊपर से भले ही हम एक दिखें क्या रिश्तों की डोर में मन की गांठे जुड़ तो जाती है , पर वे भी क्या पतंग की डोर की तरह एक समान रहती हैं ? क्या आप उसको फैंक कर नया रिश्ता नये सिरे से जोड़ सकते हो ?

निरुत्तर मैं छत की दीवार को तांक रहा था ।

( पंकज जोशी ) सर्वाधिकार सुरक्षित ।
लखनऊ । उ.प्र
04/08/2015

Friday, 24 July 2015

नुक्कड़ नाटक
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शहर के व्यस्तम इलाके के बड़े चौराहे पर मजमा लगा था । लोग उचक उचक कर देख रहे थे कि क्या हो रहा है । बड़ी भीड़ को चीरता हुआ अंदर प्रवेश किया तो देखा ' निर्भया ' को लोग इंसाफ दिलाती एक मण्डली नुक्कड़ नाटक खेल रही है।


गले में तख्ती लटकाये कुछ युवक और युवतियां अपनी बारी के इन्तेजार के बाद डायलॉग बोलते और लोग उस पर तालियां बजाते।

 "अरे आखिर कब तक यह जुल्म हम सहते रहेंगे -क्या दुनिया में इन्साफ की कोई जगह नहीं"

तभी भीड़ से एक आवाज आई "जब इतने छोटे टाइट कपडे पहनोगी तो कुछ नही बहुत कुछ होगा ।"

मात्र पन्द्रह मिनट के बाद नाटक खत्म होने ही वाला था कि तभी किसी ने एक लड़की को धक्का दिया और वह सड़क पर गिर गई ।

 ताली बजाते लोगों की निगाहे गिद्ध की भांति उसके शरीर को ताक रही थी । 

नाटक खेलने वाले और देखने वाले बुत की तरह , मौन धारण किये अपने अपने घरों को चल दिए ।

निर्भया को इन्साफ  मिल चुका था ।

( पंकज जोशी ) सर्वाधिकार सुरक्षित ।

लखनऊ । उ. प्र

24/07/2015

Tuesday, 21 July 2015

तहजीब -1
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" कोई मुझ बूढे अंधे , को सड़क पार करा दो बड़ा अहसान होगा "  फकीर राहगीरों से मदद मांग रहा था ।

कालेज अभी अभी छूटा था , तभी दो लड़के उसके पास पहुंचे उसका हाथ पकड़ा और सड़क पार कराने की जगह उसको बीच भरे चौराहे पर ले जाकर खड़ा कर दिया ।

" भगवान तुम्हारा भला करे बच्चों -जुग जुग जियो "

" हमारी नहीं अपनी चिंता करो  अब बैठो यही और  मरो ।" लड़के हंसने लगे

तभी एक  कार रुकी उसमे से एक महिला उतरी और उनमे से एक लड़के के गाल पर  झन्नाटेदार तमाचा रसीद दिया ।उसके बाद उसने बड़े सलीके को बुजुर्ग को गाडी में बिठाकर  वृद्धाश्रम  छोड़कर आते वक्त उसकी नम  आँखों में  अपने भूलों की दास्तान उभर कर आ चुकी थी । प्रायश्चित नामुमकिन था ।

( पंकज जोशी ) सर्वाधिकार सुरक्षित ।

लखनऊ । उ.प्र

21/07/2015
तहजीब
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आज मेरी कलम , दवात और स्याही मेरा साथ छोड़ कर जाना चाहती है । वे सभी अपने को एक दूसरे से काबिल समझ रही हैं " पर क्या तुम लोगों को इस बात का आभास है कि बिना मेरी उँगलियों के सहारे तुम अस्तित्व हीन हो ! "

" किस अस्तित्व की तुम बात करते हो कागज बोला अगर मैं ना हूँ तो तुम अपनी भावनाओ को उकेरोगे किसमे" फिर पीछे से स्याही की आवाज आई " अगर में रोशनाई ना बिखेरूं तो लोग कागज और तुम क्या ख़ाक पढ़ेंगे " 

इतनी देर से चुप कलम जो अब तक चुप्पी साधी हुई थी उसकी आँखों से अंगारे मानो बरस रहे थे ।
अगर मैं ना होता तो तुम्हारी ,रोशनाई ,कागज और यह लेखक सब बेकार थे । 

 सभी अपने अपने क्षेत्र के माने हुए पुरोधा थे जो किसी भी तरीके से एक दूसरे के सामने झुकने को तैयार नहीं थे।

तभी तेज बारिश लिये अंधड़ आया और लेखक के मनोभावों को जो उसने रोशनाई और कलम के साथ कागज पर उकेरे थे दूर उड़ाता ले गया । 

तहजीब बारिश के पानी घुल कर प्रकृति में रच बस चुकी थी ।

( पंकज जोशी ) सर्वाधिकार सुरक्षित ।

लखनऊ । उ.प्र

21/07/2015

Wednesday, 15 July 2015

बरसात 
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मॉनसून का मौसम इस वर्ष भी ना के बराबर ही रहा प्रदेश में , तेज चटक धूप ने धरती को चीर कर रख दिया था , भूमि बंजर हो गई थी । ठीक वही हालात अनन्या के भी थे ।
छोटी उम्र में शादी , दूसरे दिन पति के स्वर्गवास होने का दंश भी ससुराल वालों ने उसके मत्थे मड़ दिया । बापू आये और बिटिया को वापस घर ले गये ।
कुछ ही वर्षों में बिटिया के वैधव्य के गम में पिता भी चल बसे । घर का सारा बोझ उसने अपने कन्धे पर ले लिया ।
एक बार सावन में अपनी सखियों के साथ बारिश में भीग क्या गई रिश्तेदारी में मानो भूचाल सा गया । सभी ने उसकी माँ और भाइयों को चेताया कि उसके इस व्यवहार से समाज की और लड़कियों पर बुरा असर पड़ेगा तो बस माँ ने उसे कोठरी में बन्द कर दिया।
" माँ का मेरा क्या कसूर है क्या पूरी ज़िन्दगी भर सावन मेरे लिए अभिशप्त रहेगा " कोठरी से अनन्या चिल्लाई ।
हर वर्ष की तरह आज भी उम्र के आखरी पड़ाव में वह पथराई आँखों से अपने जीवन उन काले मेघो का बेसब्री से इन्तेजार करती है ।
बादल आते और बिना बरसे ही उड़ जाते , माई घर चलो कब तक यहाँ बैठी रहोगी ? पीछे पलट कर देखा तो घर का नौकर उससे चलने के लिये कह रहा था ।
निरुत्तर सी उसने अपना चश्मा पोछा और लाठी पकड़ कर ज्यों ही उठने को तैयार ही हुई थी कि आसमान में तेज कड़कदार बिजली कौंधी और झमाझम पानी ने पूरे उसके पूरे शरीर को भिगो दिया और वह निढाल होकर जो गिरी तो दुबारा ना उठ सकी । आज धरती बंजर नहीं थी ।

( पंकज जोशी ) सर्वाधिकार सुरक्षित ।
लखनऊ । उ. प्र.।
15/07/2015
मौलिक व अप्रकाशित ।

Wednesday, 8 July 2015

 वैधव्य
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कालेज में वह फेमस था , लड़कियां उसकी इक इक अदाओं पर मरती थी । आज फेयरवेल पार्टी थी , कामिनी उसकी सबसे अच्छी दोस्तों में से एक थी , कामिनी ने कागज का एक टुकड़े में कुछ लिखा और उसके कान में कुछ कहा ।

" यह क्या बेहूदा मजाक है उसने कागज के टुकड़े  टुकड़े कर हवा में उड़ा दिया ।

कुछ दिनों  उसको पता चला कि सुनील की एक्सीडेंट से मौत हो गई है ।

तब से उसने मौन  वैधव्य  धारण कर अपना जीवन उसके नाम कर दिया ।

( पंकज जोशी  ) सर्वाधिकार सुरक्षित ।

लखनऊ । उ.प्र

08/07/2015

Monday, 6 July 2015

पक्की नौकरी 
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द्वितीय विश्वयुद्ध को खत्म हुए 70 साल हो गए ! पर यह पठ्ठा है कि सुधरने का नाम ही नहीं लेता , सभी इसका स्वागत हेल हिटलर कहते हैं , कुछ तो इसको स्वर्ग का खुदा भी कहते हैं । 

 जीसस ! भी इसी का कहा मानते है । यहाँ भी तानाशाही स्टालिन ने चर्चिल से फुसफुसाते हुए कहा सामने टेबल के दूसरी ओर हिटलर और उसका सहयोगी हिम्लर ब्रेकफास्ट कर रहे थे उनकी बातें सुन कर हिटलर से रहा नहीं गया सीधे प्लेट स्टॉलिन के मुँह पर दे मारी 

 "  तो क्या तुम्हारे मार्क्स वाद को यहाँ पनपने दूँ या इस चर्चिल के ब्रिटिश साम्राज्य वाद को जिसके रानी के साम्राज्य में कभी सूर्यास्त नहीं होता था । आज मुँह छिपाते फिर रही है । 

तुम दोनों ने सर्वहारा और साम्राज्य वाद के नाम पर दुनिया में तबाही मचवाई और तुम तो कुछ बोलना नहीं रूजवेल्ट के बच्चे , तुम्हारी अमरीकी विदेश नीति ने दुनिया को तबाही के कगार पर पहुँच दिया है । 

आज ग्रीस बैंकरप्ट हैं तो वह तुम तीनो की वजह से ।

तुमने मेरी जर्मनी को लूटा, मैंने उसको पांच सालों में उसे सबसे अमीर देश बना दिया था , सबके चेहरे खिले थे ,सबके पास नौकरी थी।

दुनिया में लोग बेरोजगार है भूखे मर रहे हैं , आत्महत्या का दर बढ़ गया है । 

यह तो मैं हूँ जिसकी वजह से तुम लोगों को यहाँ दो वक़्त की रोटी नसीब हो रही है ।"

स्वर्ग में ब्रेकफास्ट रूम में भीड़ इकट्ठी हो चुकी थी लोग हेल हिटलर चिल्ला रहे थे ।

 तब तक वहां से स्टालिन , चर्चिल  ,रूजवेल्ट खिसकने में ही भलाई समझी  । 

स्वर्ग भी दो धड़ों में बंट चुका था वहाँ पर भी प्रथम विश्व युद्ध की आशंका के बादल साफ़ नजर आ रहे थे ।

" ज़िंदा ना सही मरने के बाद लोगों की नौकरी पक्की होना तय है ।"

( पंकज जोशी ) सर्वाधिकार सुरक्षित ।

लखनऊ । उ.प्र

06/07/2015

Sunday, 5 July 2015

एक था टाईगर
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एक दिन वह अपने जर्मन शेफर्ड को सुबह घुमाने ले गई तो गलती से एक व्यक्ति के घर पर बंधा पामेरियन भी था , पामेरियन भौंका तो टाइगर ने जंजीर को तेजी से छुड़ाते हुए पास में बंधे एक पामेरियन को दबोच लिया ।

" टाइगर इधर आओ छोड़ो उसको " बिटिया चिल्लाई 

वहां खड़े और लोग भी पामेरियन को बचाने में जुट गये। और उस लड़की को  भला बुरा कहने लगे " जब आप से कुत्ता नहीं सम्भलता तो इसे पालते क्यों हो ?

तभी किसी ने टाइगर के सर पर तेजी से लोहे की रॉड से वार किया ।

" बेचारी लड़की भागती हुई बदहवास सी भागती हुई घर आई !!" " मम्मी उन लोंगो ने टाइगर को लोहे से मार डाला "। 

जब तक उसको हस्पताल ले जाते तब तक उसने उसकी गोदी में अपनी आखिरी साँस ली और दुनिया से रुखसत कर गया ।

उसे आज आदमी और जानवर का   फर्क सामने ही नजर आ रहा था  ।

( पंकज जोशी ) सर्वाधिकार सुरक्षित ।

लखनऊ । उ.प्र

05/07/2015

राख
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उसकी महत्वाकांक्षा ने उसे उसकी और दिव्या की  नजरों में मुजरिम बना दिया था । 

कम्पनी में गबन के आरोप में आज पांच साल की कैद काट कर वह जेल से छूटा तो सीधे दिव्या के घर पहुँचा । दिव्या काम पर गई थी तो उसने उसके मोबाइल पर उसी जगह मिलने का समय दिया जहाँ वह अक्सर मिला करते थे । 

ऊपर से सफ़ेद चमकीली पन्नी और डिब्बी के अंदर कैद बीस किंग साइज फिल्टर वाली सिग्रेट्स के पीछे के का पीला लम्बा सा स्पंजी फिल्टर जेब से निकाल कर जैसे उसने उसमे से एक जलाई ही थी कि उसे एक आवाज सुनाई पड़ी ।

' मुझे भूल जाओ तुम अब मेरी जिंदगी में तुम्हारे लिये कोई जगह नहीं है अब ' पर यह सब तो मैंने तुम्हारी ख़ुशी के लिये किया था ? 

मेरी ख़ुशी या अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिये , मेरी ख़ुशी तो तुम्हारी बाहों में थी ना कि तुम्हारी कैदखाने की ज़िन्दगी में , कितना कुछ नहीं सुना तुम्हारे लिए मैंने विनय !! घर वालों से लेकर मोहल्ले वालो तक । 

मेरी अब शादी हो गई है और बीतीं बातों को यही दफन करो आज के बाद मुझसे मिलने की कोशिश भी ना करना।

" उसके कानों पर पड़े दिव्या के हर शब्द उसके सीने को बींध रहे थे ।"

सिगरेट अपनी पहली व दूसरी उँगलियों के मध्य दबी तेज रफ़्तार से जली जा रही थी । राख अभी भी सिगरेट के साथ चिपकी हुई थी ।

अचानक उसकी ऊँगली जली और उसने हाथ को झटका सिगरेट से बची राख भी उसकी ज़िन्दगी की तरह जमीन पर बिखर हुई  थी ।

" दिव्या वहां से कब गई उसे पता ही नहीं चला ।"

फिल्टर का आखरी कश उसने जोर से खींचा , जमीन पर बट फेंका और जूतों तलें रौंद कर चल दिया अपनी पुरानी दुनिया में जो उसे अपनाने को तैय्यार खड़ी उसका हाथ बाये इन्तेजार कर रही थी ।


( पंकज जोशी ) सर्वाधिकार सुरक्षित ।
लखनऊ । उ.प्र
05/07/2015

गुमनाम लाश
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"अगर तुमने मेरी पत्नी व बच्चों का पता नहीं बताया तो मैं मीडिया में जा कर तुम सबका भंडा फोड़ कर दूंगा । " रणजीत ने चिल्लाते हुए मीटिंग रूम में अपने चीफ को चेतावनी दी ।

' तुम ऐसा कुछ भी नहीं करोगे !! ' यह तो बस एतिहात के तहत उठाया गया कदम है , तुम्हारा उस लड़की से नजदीकी हमारे सिस्टम के खिलाफ है , इसे हम मंजूरी नहीं दे सकते हैं । 

और उस कसम का क्या जो तुमने देश के प्रति वफादारी की ली है ? 
कसम देश भक्ति की ली थी ब्लैकमेल होने की नहीं उसने जवाब दिया और तेजी से कमरे के बाहर चला आया। 

शहर के बाहर हाई वे पर एक कुचली हुई लाश पड़ी थी जिसका दाह संस्कार प्रशासन ने एक गुमनाम व्यक्ति के रूप में कर दिया।

( पंकज जोशी ) सर्वाधिकार सुरक्षित ।

लखनऊ । उ.प्र

05/07/2015

Saturday, 4 July 2015

गुमनाम लखौड़ी
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अवध के नवाब ने बड़े चाव से अंग्रेजों के लिये रेजिडेसी बनाने के लिये पहला लखौड़ी का पत्थर रखा तो उसको शायद यह भान ही ना होगा कि यह इमारत आने वाली सदी में अपने खानदान के आखिरी वारिस के लिये कांटो का ताज बनवा रहा है ।

पूरा अवध प्रांत अंग्रेजों ने वापस हासिल कर लिया । बदले में उनको रेजीडेन्सी में क्रांतिकारियों द्वारा  खेले खूनी खेल की गवाह वह खण्डर इमारत भी मिली।

असफल क्रान्ति ने नवाब को अंग्रेजों ने कलकत्ता फिर इंग्लैंड निर्वासित कर दिया ।

आज वही कभी सुंदर  रही इमारत , आज गुमनामी की धूल में दबी उस लखौड़ी की चीखें ,  प्रातः बुजर्गो व बच्चों के  चहल कदमी का स्थल व दिन में चोंच से चोंच लड़ाते  प्रेमियों के एकांत क्षणों के बीच दब कर रह गई।

( पंकज जोशी ) सर्वाधिकार सुरक्षित ।

लखनऊ । उ.प्र

05/04/2015

Monday, 29 June 2015

बंधन  :-
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आज घर में लक्ष्मी का आगमन हुआ " पर  यह क्या कोई स्वागत नहीं ! घर में यह कैसी मातम पुरसी , क्या सबने मौन व्रत धारण कर रखा है ? नवजात कन्या ने स्वयं से प्रश्न किया ।"

तभी घर में एक स्त्री की दमदार आवाज सभी के कानो में पड़ी " अरे ! मेरे तो भाग्य तो उसी दिन फूट गये थे जब से यह कुलटा ब्याह कर घर आई है । "

" अब देखो मेरे लड़के को अभी से ही इस कुलक्षणी के दान दहेज़ के प्रबन्ध के लिये अपने खून का कतरा कतरा उस सेठ  को बेचना पड़ेगा। "

समय के बीतने के साथ ही कन्या का शरीर एक युवती में परिवर्तित होने लगा उसकी बड़ी बड़ी आँखें और उभरते वक्ष स्वाभिक एक माँ की चिंता के कारण थे।

" सुनो जी ! अपनी बिट्टो अब बड़ी हो चुकी है कोई अच्छा सा वर मिल जाये तो हम नहा आये । तुम बिलकुल सही कह रही हो , पिता ने कहा । जब उसको चूल्हा चौका ही करना है तो अब अधिक पढ़ाने से क्या लाभ । "

मुंशी जी के तो जैसे भाग ही जग गये , लड़का बड़ा सरकारी अधिकारी था । लड़की की शादी में अपनी ओर से कोई कमी नहीं रखी थी पर लड़के वालों को दान दहेज में कमी लगने लगी थी।

पंखे से झूलती उसकी लाश के पोस्टमार्टम की रिपोर्ट में शरीर पर नील के निशान , कहीं कहीं पर गर्म चिमटे के दाग उसके सभी बन्धनों से अपने को मुक्त करने की कहानी बयाँ कर रहे थे ।

( पंकज जोशी) सर्वाधिकार सुरक्षित ।
लखनऊ । उ.प्र.
29/06/2015
हौसला
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कामिनी के एक्सीडेंट के बाद उसके एक पैर को काटना पड़ा । मानो उसके स्वप्नों की हत्या कर दी गई हो। वह एक अच्छी ट्रेकर थी और इस बार की ट्रेकिंग उसके लिये काफी मायने रखती थी ।

"बेटा पहले और अब में काफी अंतर है तुम अब पहले जैसी नहीं रही !! तो क्या माँ -पापा ज़िन्दगी भर अपाहिज बन कर दिन भर घर में हाथ पर हाथ धरे रहूँ , यह नहीं होगा मुझसे "।

उसके कोच ने भी उसे समझाने की कोशिश पर वह ना मानी और एक्सपीडिशन के लिए अपने को तैयार करने लगी ।

ट्रेकिंग में उसके संगी साथी सब उससे आगे चले जाते और वह धीरे -धीरे ऊपर चढ़ने की कोशिश करती रहती।

" अरे वह लंगड़ी क्या चोटी पर पहुंचेगी!!!! " एक सदस्य ने ताना मारते हुए कहा वह छप रही और अपने प्रयास में लगी रही कि अब तो सौ प्रतिशत तो दे के दिखाएगी सबको ।

चोटी पर पहुँचते पहुँचते सब की ताकत जवाब दे चुकी थी ।

 अब वह गर्व से भरी नजरों से चोटी से दूर क्षितिज का नजारा ले रही थी । आज ज़िन्दगी जीत चुकी थी ।
छुटकारा
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लम्बे समय से वह कैंसर से जूझ रहा था , मृत्यु दया की उसकी अपील उच्चतम न्यायालय भी ठुकरा चुका था । पत्नी के जेवर , बच्चों को फ़टे हाल कपड़ो में घूमते देखते हुए उसका मन कराह उठता ।

सुरसा समान बीमारी ने सब कुछ लील लिया था ।

एक रात उसने अपने पत्नी से कहा कि " क्यों नहीं तुम मेरा गला घोट कर इस लाइलाज बीमारी से मुझको और सबको मुक्त कर देती हो, आज नहीं तो कल मुझे मरना ही है तो आज क्यों नहीं ? "

अगली सुबह घर में मातम पसरा था .......


( पंकज जोशी ) सर्वाधिकार सुरक्षित
लखनऊ । उ.प्र
29 /06/2015

Thursday, 25 June 2015

कश्मकश
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पति के फालिज पड़ने के बाद गृहस्थी का सारा बोझ फूल सी कोमलांगना पर आ पड़ा था। घर में फांके पड़ने लगे ,आज तो अन्न का दाना भी घर में नहीं है , ऊपर से विधवा सास के ताने  ' अरी कलमुही आज खाने को कुछ देगी  कि तेरे बाप को बुलाना पड़ेगा !!! '

शादी के बाद  पहली बार उहापोह की स्थिति में फंसी  पड़ी थी वह कि घर से बाहर जाकर खाने का इन्तजाम करे या  घर पर ही ,  रहते हुए सबको फांके मारते मरते देख स्वयं  पंखे पर झूल जाए।

 घर की लक्ष्मण रेखा लांघ ली और अपने परिवार को भूख से मरने से बचा लिया ।

( पंकज जोशी) सर्वाधिकार सुरक्षित ।
लखनऊ । उ.प्र
25 /06/2015

Saturday, 20 June 2015

भँवर -  मायावी
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ऑफ़िस कैंटीन में अर्जुन को सिगरेट के बट पे बट बुझाते हुये देखते हुए उसके बचपन का सखा और यहाँ का बॉस कृष्ण इतना वयग्र हो चुका था कि झट से आगे बढ़ कर उसके हाथ से पैकेट छींनते हुए कहा-

 " मेरा मित्र  इतना निरीह और बेबस क्यों ?"

आप तो जानते हैं सर कि कल कोर्ट की तारीख है और उस समर भूमि में द्रौपदी के चीर हरण पर बाबा ,  ताऊ , और बांधव ,माता कुंती से जब दुर्योधन का वह नीच वकील शकुनि अपने सवाल के पांसे फेकेगा तो इसका सामना वे कैसे कर पायेंगे"
 " बस !  इतनी सी बात " आपके लिये होगी मेरे लिए जीने मारने का प्रश्न है ।"

" तुम्हारी यही बात मुझे अच्छी नहीं लगती पार्थ जब देखो तो मैं मेरा करते रहते हो  " कल का दिन रण का दिन है और तुम शोक में डूबे सिगरेट फूक रहे हो ? "

कोर्ट रूम में जज वकील शकुनि का इन्तजार कर थक चुका था । दुर्योधन की याचिका खारिज की जा चुकी थी।

गुडाकेश समझ चुका था कि उसे इस भँवर से किसने निकाला ।

( पंकज जोशी ) सर्वाधिकार सुरक्षित ।

लखनऊ । उ.प्र

08/06/2015
मंझधार :- भरोसा
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शहर के नामचीन होटल के किसी कमरें  में एक व्यक्ति अपने बड़े भाई की हत्या की योजना बना रहा है ।

श्री राम ने उस व्यक्ति की सुरक्षा का वादा करते हुए कहा कि "तुम उसे खुले में चैलेन्ज करो" । "पर बॉस वह तो ताकत में मुझसे दुगना है मैं कैसे उससे मुकाबला कर पाऊंगा ? सुग्रीव ने प्रभु की ओर मुखातिब होते हुए कहा ।

" तुम इसकी चिंता ना करो " चमचमाती दुनाली पर हाथ फेरते हुए बोले पर इसके बाद " मेरा काम तो हो जाएगा ना " "बिलकुल होगा मालिक वानर राज ने अपने दोनों हाथों को जोड़ते हुए कहा"

मरणासन्न अवस्था में बाली ने प्रभु श्री राम को हाथ जोड़ते हुए कहा " हे मर्यादा पुरुषोत्तम ! आप किस लंपट की बातों में आ गये वह तो पहले भी मुझे जान से मारने की कोशिश कर चुका था इस बार उस दुष्ट ने आपको भी ...... एक बार आप ने मुझे आज्ञा दी होती तो रावण की मैं नाक पकड़ आपके चरणों में डाल देता .. ।

राजा सुग्रीव अब हथियार त्याग कर बाली पत्नी के साथ रनिवास के सुख विलास में  लिप्त थे  और राम मंझधार में फँसे  अब  अपना हाथ मल रहे  थे ।

( पंकज जोशी ) सर्वाधिकार सुरक्षित ।

लखनऊ । उ.प्र

11/06/2015
पांचाली (अंतर्द्वंद)
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आज कुरु निवास इस्टेट में ख़ुशी का दिन है। धृतराष्ट्र को अपनी नई आँखे दान में जो मिल गई थी। बाहरी रंगीन चकाचौंध से भरी दुनिया उसको भाने लगी थी ।

गांधारी भी पतिवृता के दंश से आज उन्मुक्त हो नई ऊंचाइयों को छूना चाह रही थी ।

लाक्षागृह से पाण्डु पुत्रों का बच निकलना डी कम्पनी को पचा नहीं पा रहे थे।

अपने बहनोई जी से भी आज मामा शकुनि को द्यूत क्रीड़ा खेलने की इजाजत मिल चुकी थी ।

सभा खचाखच हुई भरी थी । भीष्म पितामह भी बड़ी मुश्किल से पास का जुगाड़ कर पाये थे।

अर्जुन अपनी .32 कैलिबर की रायफल हार कर बाकि पाण्डव के साथ मुँह लटकाये बैठा था ।

पांडव अभी भी बस एक जीत को लालायित थे।

अरे यह क्या ! " द्रौपदी अब हमारी हुई " दुर्योधन चिल्लाया

"अरे कोई जाओ और दासी को मेरे समक्ष प्रस्तुत करो " उसने आदेशात्मक स्वरुप आदेश अपने अनुज दुशाशन को देने ही वाला था कि द्रौपदी स्वयं द्यूत सभा में उपस्थित हो गई।

" तुम क्या चाहते हो मुझसे ! कुरु कुल दीपक , इन नपुन्सको से तुम्ही भले ! "

( पंकज जोशी) सर्वाधिकार सुरक्षित ।
लखनऊ । उ.प्र
16/06/2015

Saturday, 6 June 2015



 घरेलू  हिंसा
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ल्साई  हुई अनन्या की जैसे  ही आँख खुली तुरंत भागते हुए किचन  में काम कर रही अपनी माँ के गले से लिपट गई ।

“ मम्मी अब हम यहाँ नहीं रहेंगे ! अरे क्यों नहीं रहेंगे ? अन्नू माँ  ने उसके गालों को चुमते हुए कहा । हमारे घर में ना बड़े से लम्बे हाथों वाला एक राक्षस रहता है । वह रोज एक लड़की  को पकड़ने आता है और घर के बर्तन भी गिराता है ।

कल रात मैंने अपने  टेडी के साथ उसकी परछाई भी देखी थी , अच्छा अब  बहुत हो गये किस्से कहानी जल्दी से हाथ मुंह  धो में तुम्हे गर्मागर्म ढूध  देती हूँ  ।


माँ  तुम्हारी आंखों के नीचे यह काला निशान कैसा  !

( पंकज जोशी ) सर्वाधिकार सुरक्षित ।
लखनऊ । उ.प्र
06 /06 / 2015

Friday, 5 June 2015

लाल किला -
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न्नत में भी शाहजहाँ को सुकून ना था , मुमताज उसी की कब्र के बगल में लेटी हुई थी , फिर भी बादशाह की आँखों से नींद कोंसो दूर थी ।

उसे चैन की नींद सोये कई शताब्दियां बीत चुकी थीं पर उसे नींद नहीं आ रही थी ।
आखिर एक रात उसकी प्यारी बेगम ने उसका हाथ अपने हाथो में लेते हुए पूछ ही लिया – जिल्ले इलाही ! हमको धरती छोड़े कई साल हो गए पर मैं सालों से देख रही हूँ कि अरसे गुजरे हुये आपको चैन की नींद सोये देखे हुए !

आखिर क्या कारण है हमारी औलाद औरंगजेब जिसने मेरे गुजरने के बाद आपको कैद कर हमारे बेटों को मौत के घाट उतार दिया ?

" नहीं  बेगम यह बात नहीं है " मैंने हिन्दुस्तान में तीन लाल किले बनवाये थे पर उनमे से एक दिल्ली का ही ही विश्व प्रसिद्व क्यों है ? हमारी प्यार की निशानी ताजमहल के सामने किला या लाहौर का क्यों नहीं ?

हूँ " आलमपनाह बस इतनी सी बात " राजनीति प्यार में जो हावी हो गई । उठ कर मुमताज गुस्से में अपने पैर पटकते हुए अपनी कब्र में सोने चली गई ।

(पंकज जोशी) सर्वाधिकार सुरक्षित।
 लखनऊ । उ.प्र

05/06/2015

Saturday, 30 May 2015

पहचान
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भी खूबसूरत कदकाठी का मालिक सुरेश गाँव से शहर की ओर चल पड़ा अपनी पहचान बनाने को I

कालेज में एड्मिशन के दौरान एक सहपाठिनी दामिनीसे उसकी मुलाक़ात हुई I “ जो कालेज में लड़कों के जज्बातों से खेलने के लिए मशहूर थी

 “ I एक तरफा प्यार का खेल की दिनों तक चलता रहा और एक दिन उसने उस नवयुवक को भरी क्लास में एक जोरदार तमाचा रसीद दिया प्यार और तुमसे कभी शक्ल देखी हैं तुमने

नश्तर से चुभते हुए उसके शब्दों ने अनायास ही कब उसके क़दमों को धुंआ उड़ाते और शराब के ग्लासों को हलक से उतारने वालों की जमात पर लाकर खड़ा कर दिया उसे पता ही नहीं चला I


आज सालों बाद उस लड़की ने अपने इंस्पेक्टर पति के सामने उसको ना सही उसकी लाश को तो पहचान दे ही गई थी ---लावारिस नशेड़ी कहीं का ....!
( पंकज जोशी ) 

लखनऊ I उ.प्र

सर्वाधिकार सुरक्षित I


Saturday, 2 May 2015

दोहन
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लकड़ हारे के कुल्हाड़े से बरबस चोट खाता हुआ एक पेड़ अपने जीवन के अंतिम श्वाशों को गिन रहा है ।

पेड़ के टूट कर गिरने पर चरमराहट की आवाज मानो चीत्कार कर रही है। " त्राहिमाम माँ , त्राहिमाम  माँ " धरती अपने  एक संतान  के प्रति , दूसरे संतान का  असंवेदनशीलता को बर्दास्त ना कर पा रही थी।

इधर इंसानो का वनसंपदा के प्रति बढ़ते हुए लालच ने धीरे धीरे सूखे व आकाल का रूप ले लिया। अब तो वन्य जीव जंतु भी त्राहिमाम् करने पर मजबूर हो गए।

प्रकृति माँ धरती की आँखो से निकले आँसूओ के सैलाब अब सुनामी का रूप लेने लगे ।


( पंकज जोशी) सर्वाधिकार सुरक्षित।
लखनऊ ।उ.प्र.
02/05/2015