Saturday, 31 January 2015

लघुकथा:- आकाश वाणी
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हे दुष्ट पापी इंद्र , तू दिन भर सुरा के नशे में चूर अपनी सभा में सुंदर अप्सराओं से घिरा रहता है । दिन तू अपना सारा नाच गाने में बर्बाद करता है । तुझे इंद्र की पदवी क्या इसलिये दी गयी है , तू अपनी कर्तव्य निष्ठा से क्यों भटक गया । तेरा कार्य धरती लोक पर वर्षा कर वहाँ के लोंगो को खुशहाल रखना है।पर तुझे अपने रंगमंचो से फुर्सत मिले तब तो तुझे यह सब बातें पता हों । तू पापी है इंद्र तेरी इस लापरवाही की वजह से पृथ्वी लोक में ना जाने कितने किसान हर वर्ष आत्महत्या करते हैं खास तौर पर भारतवर्ष में विधर्भ ,म०प्र०,छत्तीस गढ़ , उ०प्र० का बाँदा। रात में अपनी पत्नी शची के साथ नरम मुलायम गद्दे पर सोया इंद्र हड़बड़ा कर उठ गया । अरे यह क्या अभी तो कितनी रात बाकी है जरूर मैंने दुःस्वप्न देखा होगा । भला इस आधुनिक मोबाइल युग में कोई मुझ इंद्र को भी चेतावनी दे सकता है । तभी शची ने इंद्र के पीठ पर जोरदार घूँसा जमाते हुए कहा "अरे ओ नौटंकी दिन भर रंभा , उर्वषी को नहीं छोडते और रात में उनके सपने देख कर मेरी नींद मत हराम करो ,चलो सो जाओ "
(पंकज जोशी) सर्वाधिकार सुरक्षित ।

लखनऊ । उ०प्र०

लघु कथा:-दिल्ली मेट्रो

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राज भी और लोंगों की तरह प्लेटफार्म पर खड़ा मेट्रो ट्रेन का इंतज़ार कर रहा है कुछ देर के बाद ट्रेन आई , रुकी और लोंगों का रेला उतरा और कुछ लोग चढ़ गए । ट्रेन ने अपनी गति पकड़ी और चल पड़ी नियत स्थान की ओर । एक स्थान पर मेट्रो रुकी , रात का वक़्त था सभी स्त्री और पुरुषों को अपने अपने घर पहुँचने की जल्दी है । कुछ खूबसूरत लड़कियों का झुंड चढ़ा और यात्रियों में घुल मिल गया । उनमे से एक ने मिनी स्कर्ट पहन रखी थी उसकी खूबसूरत आँखे व टांगे बरबस ही अपनी ओर किसी का भी ध्यान खींच लें कानों में मोबाइल फ़ोन के इयर प्लग , कंधे पर लटका लेपटाप बैग मानो वह किसी बड़ी कंपनी मे साफ्टवेयर इंजीनियर हो । चलती ट्रेन में अचानक कोई मुलायम हाथों की उंगलियाँ उसके मजबूत हाथों से अचानक टकरा जाती हैं और उसके रोमांच से राज के पूरे शरीर में एक लहर सी उठ जाती है सिलसिला बदस्तूर जारी रहता है तभी अचानक ब्रेक लगने से गति पकड़ी हुई ट्रेन रुक जाती है और उस लड़की का शरीर राज से आकर टकराता है । आपस में सौरी बोलकर एक दूसरे के प्रति औपचारिकता निभाते हुए कनखनियों से देखतें हैं थोड़ी देर बाद स्टॉप आता है और , और लोंगों की तरह राज भी स्टेशन पर उतर कर , गुजरे हसीं पलों की यादों को संजोये तेजी से बाहर की ओर निकलता है और बाहर पहुँच कर वह ऑटो को बुलाता है। सहसा ही उसका ध्यान अपनी पेंट की पीछे की पाकेट पर जाता है और उस समय उसका सारा रोमांच काफूर जब उसे यह ज्ञात होता है कि उसका तो पर्स ही गायब है , पूरा शरीर पसीने से तर -बतर उसके तो पूरे महीने की उसकी सैलरी ही गुम हो चुकी थी । तभी उसे पीछे से कुछ लड़कियों के हंसने की मधुर आवाज सुनाई पड़ती है अरे यह तो वहीं लडकियाँ हैं जो उसके साथ मेट्रो के अंदर थीं , हाथों पर हरे हरे कागज के कुछ नोट गिन रही थी । ,जब तक वह अपनी प्रतिक्रिया करता उन्होंने ऑटो वाले को उन्होंने आवाज दी और उसमें बैठ कर चलते बनीं । सड़क के इधर उधर उसने नज़रें दौड़ाई तो सड़क के एक कोने में जमीन पर पड़ा उसे अपना खाली पर्स दिखाई दिया उसको यह समझते हुए जरा भी देर नहीं लगी हो ना हो इस जेबकतरी में उसी खूबसूरत टांगो और कोमल नाजुक उँगलियों का हाथ है ।
(पंकज जोशी) सर्वाधिकार सुरक्षित ।
लखनऊ । उ०प्र०
31/01/2015

Thursday, 29 January 2015

लघुकथा :- राहुकाल
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कहा गया है कि राहुकाल दिन में एक बार आता है वह भी डेढ़ घंटे के लिये , सूर्यास्त से पहले । सेठ रामानंद की बीच बाजार में ज्वेलरी की दुकान है , करीब पचहत्तर साल पुरानी उनकी गद्दी है और उनका ग्रहों की चाल पर बड़ा यकीन है हर कार्य की शुरआत शुभ मुहुर्त के साथ शुरू होती है। अभी पिछले हफ्ते की बात है अपने पीढ़ी पुराने पंडित जी के कहने पर शेयर बाजार में लाखों रूपये का सट्टा खेल गये उस दिन ग्रहों की चाल सही थी और रातों रात उनकी किस्मत के सितारे बुलंदी को छू गये । कहते हैं कि बिना मेहनत के कमाया पैसा हराम का होता है और वह ज्यादा देर तक टिकता नहीं जैसे आता है वैसे ही चला जाता है । ठीक वही सेठ जी के साथ भी हुआ आज बाज़ार उलटी चाल चल दिया , बड़ी उलट फेर के साथ , वायदा कारोबार , बंद हुआ। जितना कमाया नहीं उससे ज्यादा का गवां बैठे । सेठ जी का पूरा शरीर पसीने-पसीने था , पंडित के कहने पर आज फिर सट्टा खेल गये । पंडित से बाज़ार की उलट चाल को जानने के लिये फ़ोन मिला-मिला कर थक चुके थे "अरे यह क्या इसका तो फोन ही स्विच ऑफ आ रहा है " सेठ जी मन ही मन बुदबुदाये । आखिर में झक मार कर सेठ जी ने अपनी गद्दी के पास पड़े अखबार के पन्ने पलटने लगे तभी उनकी नज़र आज के पंचांग पर पड़ी -"यह क्या फिर वह मन ही मन बुदबुदाये प्रातः साढ़े नौ से ग्यारह बजे तक राहुकाल लगा है यथा संभव संभल के रहे"। तो क्या पंडित ने पैसा राहुकाल के समय लगवा दिया । "अरे पंडित ये क्या कियो मारो साथ तू तो मारे पीसो को डुबवा दियो " आण दे थारी सारी पंडिताई निकलवा ना दी तो देख। हाय मेरो पीसो हाय राहुकाल
(पंकज जोशी) सर्वाधिकार सुरक्षित ।
लखनऊ । उ०प्र०
29/01/2015


Wednesday, 28 January 2015

लघुकथा :- स्टेटस सिम्बल
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अरे आप अभी तैयार नहीं हुए सुवर्णा अपने पति से बोली । डार्लिंग मैं तो तैयार हूँ अगर आप तैयार हो गयीं हों तो चले एक मिनट रामू काका रूबी कहाँ है रूबी रूबी...देखिये ना एक काम भी ये नौकर ठीक से नहीँ कर सकते हैं अभी तो पार्लर से लाई थी उसे कहीं उसके बाल ना ख़राब हों जाये सुवर्णा अपने पति से शिकायत कर ही रही थी तभी रूबी सुवर्णा की तरफ तेजी से भागते हुए आई और सुवर्णा ने उसे दौड़ कर अपनी छाती से चिपटा लिया । माय बेबी डार्लिंग व्हेयर यू वर आइ वास सो मच वरीड अबाउट यू। सुवर्णा ने अंग्रेजी में कहा । देर हो रही है चलेंगे की नहीं माथे पे मोटी सी बिंदिया ठोकते हुए अपने पति से बोली...अरे मैं तो कब से आपका इंतज़ार कर रहा हूँ । कार में बैठते हुए मेंमसाहब ने अपने नौकर रामू को हिदायत दी देखो बाबा और बेबी को ठीक से खाना खिला कर सुला देना और ज्यादा देर टीवी मत देखने देना । जी मेमसाहब रामू बोला । सुवर्णा अपने पति के साथ कार के अंदर रूबी को लेकर बैठ गई । उधर सिंह साहब के घर शहर के नामी गिरामी समाज सेवकों का जमघट लगा हुआ है , हाथों में लबरेज छलकते जाम , तभी सुवर्णा अपनी गाड़ी से रूबी के साथ उतरती हैं सभी लोग तुरंत उनको घेर के खड़े हो जाते हैं आखिर चीफ सेक्रेट्री की बीवी जो हैं बस लोग शुरू हो गये उनकी तारीफों के पुल बाँधने । तभी उनमे से एक इन्द्राणी उसके पास आई , दोनों गले लगे उँवा-ऊँवा किया ,अरे मिसेज वर्मा कितना प्यारा डॉगी है हाउ स्वीट आपने कितने अच्छे ढंग से इसको सजाया है । बडा महंगा होगा जब इसके बच्चे होंगे तो हमको भी दीजियेगा । डोंट बी सिली इन्द्राणी अगर इसके बच्चे होंगे तो इसका फिगर नहीं खराब हो जायेगा और यह क्या आप इसे डॉगी कह रहीं हैं , यह तो मेरी अपनी बेटी से भी बड़ कर है समझी ना आप मुँह बनाते हुए सुवर्णा बोली अजी सुनते हैं आप देखिये यह सब हमारी बिटिया रानी को डॉगी बुला रहें हैं । अरे आप तो बुरा मान गयीं मिसेज वर्मा अरे हम तो आपके साथ मजाक कर रहे थे आप तो बुरा मान गयीं , अरे भई कोई मेडम के लिए ड्रिंक भी लाएगा या यों ही उनको खड़ा कर रखेंगी । लाइये तो सही थोड़ी देर हम भी तो आपकी बिटिया को अपनी गोद में उठा लें , हमारी प्यारी रानी बिटिया ऊओन् रूबी रूबी । उधर मेडम चौडियाँ कर कुर्सी में ऐसे बैठ गई मानो उनका स्टेट्स सबके बीच बड़ गया हो ।
(पंकज जोशी) सर्वाधिकार सुरक्षित ।
लखनऊ । उ०प्र०
28/01/2015


लघुकथा :- सोशल साईट

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सोशल साईट की दुनिया एक आभासी दुनिया होती है और यह आभासी दुनिया जितनी सच्ची होती है उतनी झूठी भी । इस रंगमंच के किरदार भी अनेक होते हैं , हर पल हर समय बदलते चेहरे कुछ मखौटे ओढे , तो कुछ लड़के व लड़कियाँ नकली प्रोफाइल बना कर चैटिंग करते साइबर कैफे में मजमा लगाये प्रायः मिल जायेंगे । आज यह आभासी दुनिया ख़त्म होने वाली थी क्योंकि विक्रम की फेसबुक फ्रेंड जिनको वह दीदी जी भी कहता है , उनका मेसेज आया था कि आज मैं आपके शहर में आईं हूँ , मुलाक़ात संभव है । तय समय पर उनकी मुलाकात होती है । वहाँ पर उसे अपनी तरह के दो चार और लोग भी मिलते , जो उसकी ही तरह एक ग्रुप से जुड़े हुए है । सब प्रसन्नता का अनुभव करते हैं कि रक्त संबंधो के अतिरिक्त यह भी उनका अपना ही परिवार है । आज महीनों से चली आ रही आभासी दुनिया समाप्त हो चुकी थी सब कुछ वास्तविक ,असली था ।
(पंकज जोशी ) सर्वाधिकार सुरक्षित ।
लखनऊ । उ०प्र० ।
27/01/2015

Monday, 26 January 2015

लघुकथा :- ब्रेकिंग न्यूज
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यह कोई शरीफ लड़कियों के घर आने का समय है आरती , माँ ने उसे डपटते हुए कहा। सुबह से तेरी फिक्र में अन्न का दाना नहीं खाया मैंने । " अम्मा जरूरी काम में फँस गयी थी "आरती बैग पटकते हुए बोली। काश तेरे पापा आज ज़िंदा होते ...कहते हुए उसकी माँ की आँखों में आँसू आ गये । कहाँ गुल खिला कर आ रही है -किसके साथ आँख मट्टका चल रहा है तेरा कलमुहीं , तेरी सारी दोस्तों को फ़ोन किया तो बोल रही थी कि आंटी जी आरती तो हमारे साथ ही कालेज से निकली थी । देख तू मुझसे झूठ ना बोलियो पहले ही बताये दे रही हूँ तुझे इसी गरम चिमटे से मारूँगी । कुछ नही माँ कालेज से हम लोग साथ ही निकले थे पर चौराहे पर जाम लगा था। मीडिया का पूरा जमावड़ा लगा पड़ा था । पास पहुंची तो देखा -एक आदमी कार दुर्घटना में जख्मी हालत में पड़ा दर्द से कराह रहा है । सब लोग भीड़ लगाये उसे घेरे मीडिया के कैमरे के आगे फ़ोटो खिंचाने मे व्यस्त थे । किसी को उस घायल की फ़िक्र ही नहीं थी । अब तूने ही तो अम्मा बचपन से हमें सिखाया की लोगों की मदद करनी चाहिये तो तू ही बता मैं उसे मरने के लिए कैसे छोड़ देती । तो क्या किया ? माँ ने उत्सुकता से उससे पूछा , फ़ोन करके माँ मैंने एम्बुलेंस मंगायी थी । तो बच गया क़ी नहीं फिर उसकी माँ ने उत्सुक्तापूर्वक आरती से पूछा। नहीं माँ हस्पताल ले जाते हुए रास्ते में बेचारे ने दम तोड़ दिया । कोई बात नहीं मेरी बच्ची माँ ने उसे पुचकारते हुए प्यार से उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा । तूने अपना फर्ज अदा किया बाकी जैसी रब की मर्जी । मेरी बच्ची अपना जी ना छोटा कर , चल तू हाथ मुँह धो कपडे बदल मैं तेरे लिए खाना गर्म किये देती हूँ । माँ अंदर किचन मे बड़ बड़ाते जा रही थी हाय ! यह मुये रिपोर्टर पैसे में चक्कर में इंसानियत ही भूल गए हैं जैसे कभी इनका नंबर नहीं आयेगा । काश ब्रेकिंग न्यूज की जगह हस्पताल ले गए होते तो उस बदनसीब की माँ के घर भी इस समय चिराग जल रहा होता ।


(पंकज जोशी) सर्वाधिकार सुरक्षित ।
लखनऊ । उ०प्र०
26/01/2015

Sunday, 25 January 2015

लघुकथा:-  मनचले

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रोजी,अपने चार भाई बहनों में सबसे बड़ी है। बचपन में ही उसके पिता ने उसकी माँ को छोड़ कर दूसरी शादी कर ली थी । बचपन का संघर्षमय जीवन ,भाई बहनों की पढ़ाई और माँ की बीमारी ने उसके आगे पढ़ने लिखने के सभी रास्ते बंद कर उसे छोटे-मोटे काम कर पैसा कमाने के लिये मजबूर कर दिया था । कभी वह बार डांसर का काम करती तो कभी किसी रईस की महफ़िल में गाने गाती । धीरे-धीरे रोजी की मेहनत रंग लाने लगी और एक दिन उसे एक विज्ञापन की एजेंसी में नौकरी मिल गई । रोजी के पहले टीवी एड ने रातों रात उसको स्टार बना दिया था । जिस मोहल्ले के लोग उससे व उसके परिवार से अनभिज्ञ थे । आज वही उसकी चर्चा कर रहे थे । मशहूर रोजी को अब रोज देर रात घर लौटते वक्त मोहल्ले के नुक्कड़ पर खड़े बीड़ी सुलगाते मनचलों का सामना करना पड़ता है । इस बार तो हद ही पार हो गयी जब उसे एक दिन अपनी बीमार माँ की दवाई लेने के लिये सुबह-सुबह मेडिकल स्टोर जाना पड़ा । मेडिकल स्टोर की ओर को  बड़ते उसके  कदम भरी भीड़ में अचानक ठिठक के रूक जातें हैं जब उसको अहसास होता है कि उसके हाथ को किसी ने पकड़ रखा है। इससे पहले कि वह पीछे मुड़ कर देखती तभी उसके कानों पर आवाज़ पड़ती है जानेमन रोज औरों की रातें गुलजार करती हो कभीकभी हमारे भी हालचाल ले लिया करो । रोजी  तेजी से पीछे घूमी और खींच कर एक जोरदार तमाचा रसीद दिया उस मनचले के गाल पर । क्रोध से कांपती रोजी की आँखों से झरते आंसूओं की अविरल धारा मानो उससे पूछ रही हो-कि "क्या लड़की होना अभिशाप है ?"

(पंकज जोशी) सर्वाधिकार सुरक्षित ।
लखनऊ । उ०प्र०
25/01/2015
लघुकथा :- सहकर्मी
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रवि और आकाश दोनों बचपन के साथी थे और एक ही मोहल्ले में रहते थे साथ ही खेलकूद कर बड़े हुए । दोनों एक दूसरे पर जान छिड़कते थे । साथ-साथ स्कूल पास किया और अलग-अलग कालेजों से दोनों ने इंजीनीयरिंग की परीक्षा पास कर डिग्री हासिल की और इत्तेफ़ाक़ की बात है कि दोनों की नौकरी भी एक ही कंपनी में लगी । रवि बचपन से ही महत्वाकांक्षी था उसको हमेशा नंबर एक पर आने का एक जुनून ,नशा सा था। इसके विपरीत आकाश का सरल ह्रदय व लोंगों के प्रति उसके अपनापन ने उसको कंपनी के लोंगों के बीच लोकप्रिय बना दिया दिया था । रवि उसकी इस लोकप्रियता को पचा नहीं रहा था। मित्र होने के बावजूद वह उससे कहीं ना कही अंदर ही अंदर जलता था। और उसे अक्सर लोगों की नज़र से नीचे गिराने के अवसर ढूंढा करता था । अक्सर वीकेंड में दोनों बाहर घूमने जाते ,पार्टी शार्टी करते। इसी बीच करिष्मा ने कंपनी को ज्वाइन किया वह भी रवि की तरह महत्वाकांक्षी थी उसको भी नम्बर एक पर रहने की बीमारी ने अपने चंगुल में जकड़ रखा था । जल्दी ही तीनों अच्छे दोस्त बन गये । अब हर वीकेंड पर तीनों लोग देर रात तक पार्टी करते । मार्च के महीने में प्रायः हर कंपनी मे अप्रेजल होता है । शातिर दिमाग और ऊपर से खूबसूरत हुस्न किसी पर भी कहर ढहा सकता है । खूबसूरत लड़कियां रवि की कमजोरी थी पर करिश्मा तो खुद बखुद उसकी ओर खीचीं चली आ रही थी । और इस वीकेंड पर करिश्मा ने बाहर ना जाने के बजाय दोनों को अपने फ्लेट पर बुलाया। जाम के जाम छलक रहे थे । शराब आकाश की कमी थी । इस बात को करिश्मा बहुत जल्दी समझ गई थी । उसने एक तीर से दो निशाने लगाने की ठानी । जब पार्टी अपने पूरे शबाब पर थी। उसने चुपचाप रवि के कान में कुछ कहा और एक पुड़िया रवि के हाथ में पकड़ा दी । रवि ने करिश्मा का इशारा समझ आकाश की ड्रिंक मे नशीली दवाई मिला दी । और अगले दिन जो हुआ वह आकाश और रवि के समझ के परे था उसने दोनों पर थाने में जाकर बलात्कार का मुकदमा ठोक दिया था । अब लड़की ने कोई बात कह सुनाई तो दुनिया आसानी से उसको पीड़िता समझ लेती है और समाज की सहानुभूति उसके प्रति हो ही जाती है । तुरन्त मीडिया का जमावड़ा आ खड़ा हुआ । कंपनी की रेप्यूटेशन दावँ में लगा देख रवि और आकाश को कंपनी से निकाल दिया जाता है और मुकदमा वापस लेने और अपना मुँह बंद रखने के लिये करिश्मा को कंपनी में पदोन्नति व अधिक वेतन की देने की पेशकश , उसकी इज्जत के एवज में, की जाती  है । आकाश इस शर्मिंदगी को बर्दाश्त नहीं कर पाता और एक दिन अपने पन्द्रह मंजिल के फ्लैट से छलांग लगा कर मौत को अपना लेता है । इधर कम्पनी करिश्मा को नये डिपार्टमेंट का हेड बना कर उसका ट्रांसफर विदेश में कर देती है और रवि आज भी एक नई नौकरी पाने के लिए दरबदर की ठोकर खा रहा है । आज कोई कंपनी उसे नौकरी देने को तैय्यार नहीं है । वह उस मनहूस पल को याद करके पछता रहा है जब उसने आकाश की ड्रिंक में नशीली दवा मिलाई थी । कहते है जो व्यक्ति दूसरों के लिये गड्ढा खोदता उसमें वह स्वयं गिर जाता है पर उसकी सहकर्मी करिश्मा कैसे गढ्ढा पार कर गयी यह रहस्य आज भी रवि के लिए पहेली बना हुआ है ।
(पंकज जोशी) सर्वाधिकार सुरक्षित ।
लखनऊ । उ०प्र०

25/01/2015

Friday, 23 January 2015

लघुकथा:- पहला प्यार
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राहुल आज भी ठीक उसी चौराहे पर खड़ा अपनी प्रेयसी का इंतज़ार करता है । यह उसकी रोज की दिनचर्या का हिस्सा है वह ठीक शाम पांच बजे रग्घू चाय वाले की दुकान पर बैठता ,चाय पीता, अपने कुर्ते की जेब से सिगरेट wills का पैकेट निकालता फिर धीरे से माचिस से उसको जलाता , एक लम्बा गहरा कश और हवा में धुंए का छल्ला बनाता और जब रात घिरने को आती तो वह वहाँ से उठता और चल देता दारु के ठेके पर अपना गम गलत करने को । सारा शहर उसे पगला मजनूं कह कर चिढाता ,लंबी दाड़ी ,पिचके गाल,मैला कुर्ता पैजामा, पैरों में टूटी चप्पल ,शरीर से आती दुर्गंध कहती कि ना जानें कब से इसने नहाया नहीं । उसकी माँ भी उसे समझाते समझाते स्वर्ग सिधार गई 'बेटा अब तो अपना घर बसा लें । उसकी कभी अच्छी खासी क्लास -l की सरकारी नौकरी थी , उसको भी उसने लात मार दी। राहुल की उदास, देवयानी को ढूंढती , आँखें मानो उसको आश्वश्त करती हैं कि आज नहीं तो कल देवयानी जरूर आयेगी । पर देवयानी तो इस दुनिया में थी ही नहीं उसकी मौत तो बहुत पहले ही हो चुकी थी । – पर अधेड़ उम्र का राहुल इस बात को आज भी नहीं स्वीकार करता हैं वह तो यह समझता है कि सारा ज़माना उससे बैर पाले हुए है उसकी प्रेयसी एक दिन जरूर आयेगी । देवयानी ने उससे वापस आने का वादा जो किया था । ट्रेन में चढ़ते वक्त जब वह दीवाली की छुट्टी पर अपनी बीमार माँ से मिलने ,अपने घर जा रही थी । तब राहुलने मजाक के लहजे में कहा -" भूल तो नहीं जाओगी वहाँ जाकर मुझे" अरे ऐसे कैसे भूल सकती हूँ । कोई सदा के लिए थोड़ी ही जा रहीं हूँ । देवयानी ने राहुल को उत्तर दिया। फिर राहुल के गाल पर प्यार से अपना हाथ फेरते हुए बोली –"अपने पहले प्यार को भी कोई भूल सकता है । बस दोतीन दिन की ही तो बात है । बस यूँ गयी और ऐसे लौट कर आयी । इस बार तो माँ भी साथ आयेंगी कह रहीं थीं "पगली एक बार तो राहुल से मिला देखूँ तो सही जिसके प्यार में मेरी लड़की इतनी पागल है वह देखने में कैसा होगा " दोनों काफी देर तक ट्रेन की खिड़की से ही एक दूसरे का हाथ पकडे आँखों ही आँखों में एक दूसरे के चेहरे में मानो बिछुड़ने का भाव पढ़ रहे थे । इधर ट्रेन ने सीटी दी , उधर गार्ड साहब ने हरा सिग्नल दिया और वक्त ने धीरे-धीरे एक दूसरे के हाथों को छुड़ाने की कोशिश की, पर आखिर में दोनों ने एक दूसरे की उँगली को छुआ फिर अलग हो गये । जल्दी आना राहुल ने चिल्ला कर कहा-उधर देवयानी की आवाज आई तुम भी अपना ख्याल रखना ,गाडी धीमी चलाना । आवाज के साथ फिर वह ओझल हो गयी । अगले दिन सुबह की चाय की चुस्की लेते हुए राहुल ने जैसे ही दरवाजे पर पड़ा अखबार उठाया , चाय का प्याला उसके हाथ से छूठ गया,और प्याले के गिरने की आवाज दूर तक सुनाई पड़ी ,उसके हाथ काँप रहे थे , होंठ कुछ बुदबुदा रहे थे -रामपुर जाने वाली ट्रेन दुर्घटना ग्रस्त , आधा दर्जन यात्रियों की मौत व पच्चास घायल , मरने वालों में एक नाम देवयानी का भी था । उसका पहला प्यार अब इस दुनिया में नहीं था ।
(पंकज जोशी) सर्वाधिकार सुरक्षित ।
लखनऊ । उ०प्र०
२३/०१/२०१५


Thursday, 22 January 2015

लघुकथा:-गुरुदक्षिणा
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अरुण रोज की तरह आज भी कक्षा की पहली पंक्ति में बैठा सरकारी स्कूल में पढने वाले और बच्चों की तरह , गणित के मास्साब शर्मा जी का इंतज़ार कर रहा है कि कब गुरू जी की तबियत ठीक होगी और उनका कोर्स ख़त्म होगा । बोर्ड की परीक्षायें सिर पर आ खड़ी हुईं थी । उससे पिछले अध्ध्याय के कठिन सवाल हल नहीं हो पा रहे हैं । उधर मास्साब अपने घर में मेडिकल लीव लेकर प्राइवेट ट्यूशन ले रहे हैं । आज महीने की पहली तारीख हैं इधर सरकारी तनख्वाह उनके बैंक के खाते में पहुँचेगी उधर ट्यूशन पढ़ने आने वालों से मिलने वाली गुरु दक्षिणा ,गुरु जी के दोनों हाथों में लड्डू और सिर कड़ाई में । वाह रे सिस्टम ।
(पंकजजोशी) सर्वाधिकारसुरक्षित ।
लखनऊ । उ०प्र०
२२/०१/२०१५


Wednesday, 21 January 2015

लघुकथा:- पंचायत
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ठाकुर राम सिंह ,अपने गाँव के प्रधान हैं । बरसों से उनके ही परिवार का सदस्य ही अब तक प्रधानी करता हुआ आया है , बड़ा दबदबा है उनका पूरा अपने क्षेत्र में। अंजू ठाकुर की इकलौती बेटी थी ,देखने में बेहद खूबसूरत मानो मोम की गुड़िया । जो भी एक बार उसे देख ले तो बस उसे देखते ही जाये। एक तो खूबसूरत, ऊपर से जवानी ,बिलकुल आग में घी का काम करे । गाँव मे ही रहने वाला निचली जति का नवयुवक प्रताप जो अंजू की खूबसूरती पर पहले से ही फ़िदा था, मेले में एक बार दोनों की आँखे चार हुई और पहली ही नजर में दोनों एक दूसरे को अपना दिल दे बैठे । छुप-छुप के मिलने का सिलसिला कुछ दिनों तक यूँ ही चलता रहा । जब तक ठाकुर के कानों तक खबर पहुँचती दोनों ने भाग कर शादी कर ली । गाँव में यह खबर अब तक आग की तरह फ़ैल चुकी थी और ठाकुर यह जिल्लत बर्दाश्त नहीं कर पा रहा था कि उसकी बरसों की कमाई धाक पर कोई यूँ ही पानी फेर देगा । आज ठाकुर के घर पर मजमा लगा है , पंचायत बुलायी गयी है । ,गाँव का थानेदार भी अपनी पलटन के साथ वहां मौजूद है । प्रताप के माँ-बाप रहम की भीख मांग रहें है । मुँह से निकला खून इस बात की गवाही था कि दोनों को बुरी तरह से पीटा गया था । अंत में फैसला हुआ की चूँकि प्रताप, ने निचली जाति का होते भी जानबूझ कर ठाकुर की इज्जत पर हाथ डाला और अंजू , जो कि ठाकुर की लड़की है उसने अपने समाज और परिवार की मान मर्यादा के विरूद्ध घृणित कार्य किया है अतः पंचायत दोनों को बराबर का दोषी मानते हुए सजाये मौत सुनाती है और साथ ही प्रताप के माँ-बाप का हुक्का पानी भी बंद कराने का तालिबानी फरमान जारी कर देती है । यह सब कार्यक्रम पुलिस की देख रेख में हुआ । कुछ सप्ताह बाद दो लोंगो की लाश ,जिनमें एक लड़का व लड़की थे ,पेड़ पर लटकी हुई पायी गयी । सबने एक सिरे से लाशों को पहचानने से इनकार कर दिया । पुलिस आई लाशों को पेड़ से उतारा गया पंचनामा हुआ आत्महत्या का केस बना । और लाशों को लावारिश घोषित कर तुरन्त उनका क्रियाकर्म भी कर दिया गया । ठाकुर आज बीमार है और मृत्यु शैय्या पर पड़ा अपनी ज़िदगी के आखिरी दिन गिन रहा है परंतु उसे अपनी हठधर्मिता पर तनिक भी मलाल नहीं है । वह आज भी उसी शान से अपनी मूछों को ताव देता है । वह आज भी अपने को अपनी बिरादरी, समाज व धर्म का ठेकेदार,रक्षक मानता है ।
(पंकज जोशी) सर्वाधिकार सुरक्षित I
लखनऊ । उ०प्र०
२२/०१/२०१५

Tuesday, 20 January 2015

लघुकथा :- बेगाना घर
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बड़े अरमानों से पंडित आत्माराम जो कि एक आर्य समाजी हैं , ने अपनी बड़ी बेटी रश्मि की शादी एक विजातीय परिवार में, अपने ही विभाग के अधिकारी सुभाष जी, जो कि स्वयं एक सत्संगी हैं , के लड़के प्रभात से ,जो की सिचाई विभाग में जूनियर इंजीनियर के पद पर कार्यरत है , के साथ यह सोच कि सत्संगी परिवार है वहाँ उनकी लड़की हमेशा सुखी रहेगी , के साथ बड़े ही धूमधाम के साथ कर दी । शादी के कुछ समय तो रश्मि को उसके ससुराल वालों ने अपनी पलकों में बैठाया पर जब रश्मि की कोख से एक के बाद एक तीन लड़कियाँ पैदा हुई तो वही सत्संगी परिवार अपने वंश को बढ़ाने के नाम पर लड़का ना पैदा करने का दोष अब रश्मि के मत्थे मढ़ने लगा । सास ससुर व ननदों के ताने सुन कर तो रश्मि के कान पक गए थे । पर हद तो तब पार हो गई जब उसका पति रोज रात में शराब पीकर घर आता और उसके साथ मारपीट करता । इस बार रश्मि फिर से माँ बनने वाली है और ससुराल वालों ने उसके पति को सख्त हिदायत देते हुये उसे उसके पिता के घर छोड़ आने को कहा । और चलते वक़्त सख्त हिदायत दी कि अगर इस बार भी लड़की जनी तो उसे वापस इस घर पर आने की जरूरत नही। रश्मि ने अपने घर पहुँच कर अपने पिता को इतने सालों से ससुराल में अपने ऊपर हुए जुल्म को सुनाया तो बूढे बाप का दिल भर आया । पर मजबूर बाप कर भी क्या सकता था उसको अपनी छोटी बेटी की शादी भी तो करनी थी । अगर बड़ी लड़की को ससुराल वालों ने घर से निकाल दिया तो समाज दस तरह की बातें बनायेगा ,उसके माथे पर कुलक्षणी , डायन और ना जाने कौन कौन से नामों से बड़ी बेटी को समाज बुलायेगा तो छोटी की जीवन नैय्या कैसे पार लगेगी । अगले दिन पंडित जी ने उसको अपने ससुराल वापस जाने का फरमान जारी कर दिया यह कहते हुए कि बेटी की डोली मायके से निकलती है और अर्थी ससुराल से । आज उसका घर जहाँ वह पली बड़ी और खेली थी अब वोही उसके लिए "बेगाना घर " हो गया था । आज वह ना घर की रही ना ससुराल की । अगले दिन मछुवारों ने रश्मि की लाश को नदी में बहते हुए पाया । रश्मि आज समाज की झूठी शान पर कुर्बान हो गयी थी ।
(पंकजजोशी)सर्वाधिकारसुरक्षित।
लखनऊ।उ०प्र०
२०/०१/२०१५


Monday, 19 January 2015




लघुकथा :- मुक्ति
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गुटखे (पान मसाला) का सेवन इतना हानिकारक हो सकता है , यह बात तो अरविन्द ने कभी सपने में भी नहीं सोची थी । अभी उसकी उम्र ही कितनी थी मात्र तीस साल की । उसके पिता जी को फालिज पड़ने के कारण अपनी नौकरी से हाथ धो बैठे थे । पत्नी ,तीन छोटे बच्चे और गाँव में उसके बीमार बाप और बूढी माँ इन सबकी जिम्मेदारी का  बोझ अब उसके कन्धों पर था। अक्सर वह डिपो में मीटिंग के दौरान दर्द से दोहरा हो जाता था । एक बार जब हम लोंगो ने उससे दर्द का कारण पूछा तो उसने अपने गाल के अंदर के हिस्से पर सफ़ेद झिल्ली दिखाई और कहने लगा कि इसमें पता नही क्यों दर्द होता है । सभी लोंग उसको गुटखा व शराब छोड़ने की बात कहते तो वह हँस कर टाल देता कि मामूली सा जख्म है ठीक हो जायेगा । आज करीब चार साल बाद मेरी अचानक उससे बाजार मे मुलाक़ात हुई , मैं तो उसे पहचान ही नहीं पाया उसके गाल पर लंबा सा चीरा और टाँके के निशान जो थे । उस पर वह अपना मुँह भी ठीक ढंग से बोलने के लिये खोल भी नहीं पा रहा था , पता नहीं कैसे बेचारा खाता पीता होगा । शरीर सूख कर काँटा हो गया था उसका । दौड़ कर वह मेरे गले लग गया और फफक कर रोने लगा मैंने भी उसे गले लगा कर उसका हाल-चाल पूछा तो वह गाल की ओर इशारा करके  बोला कि उसको कैंसर हो गया है । यह सब सुन कर , मेरे तो पैरों तले जमीन ही खिसक गयी कि कैंसर तो एक लाइलाज बीमारी है । बताने लगा काफी खर्चा हो गया है गाँव में जो जमीन थी वह भी बिक गई इलाज में । वह बोले जा रहा था और मैं चुपचाप उसकी बातें शांत मन से सुनता जा रहा था । चलते वक्त उसने मुझसे हाथ मिलाया और कहने लगा पता नहीं मैं कब तक इसे खीँच पाउँगा । मैंने उसको दिलासा देते हुए कहा ऐसा कुछ भी नहीं होगा मैं भी जानता था कि उसको झूठी दिलासा दे रहा हूँ । इधर काफी दिनों से मैनें उसको फ़ोन मिलाने की कोशिश की पर सब व्यर्थ हर बार उसका फ़ोन स्विचड ऑफ बता रहा था । मैं भी आई गई बात सोच कर भूल गया और अपने काम पर लग गया । एक दिन मुझे अरविन्द के गुज़र जाने की खबर मिली ।इस घटना ने मुझे झकझोर के रख दिया और यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि अरविन्द को तो कैंसर से मुक्ति मिल गयी पर इस मुक्ति ने , जिसका जवान कमाऊं पूत गुजर गया हो , उसके बेसहारा बूढ़े माँ-बाप , पत्नी व बच्चों का क्या हाल होगा , ना जाने किस हाल में होंगे , क्या बीत रही होगी उन पर ।
(पंकज जोशी) सर्वाधिकारसुरक्षित ।
लखनऊ। उ०प्र०

१९/०१/२०१५

Sunday, 18 January 2015

लघुकथा:- तपस्या
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चुनाव आयोग ने आज चुनावी समर की घोषणा कर दी है। उधर नेता रामपाल जी अपने समर्थकों के साथ पार्टी कार्यालय के बाहर हैरान और परेशान से खड़े है। इस दुविधा में कि इस बार का टिकट उन्हें मिलेगा कि नहीं । नेता जी का सामाजिक कार्य में प्रदार्पण उन्नीस वर्ष की अवस्था में कालेज के छात्र संघ चुनाव के अध्यक्ष पद के चुनाव जीतने के साथ से शुरू हुआ था। तब किसी पार्टी का टिकट लेने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता था। बस मुट्ठी भर लड़के लेकर जाओ और नामांकन पात्र भरो और कूद पड़ो चुनावी समर में। आज नेता जी की उम्र चौसठ वर्ष की होने को आई है,आज ही उनका जन्मदिन भी है।उन्नीस वर्ष की युवावस्था से चौसठ वर्ष तक की उम्र का सफ़र तय करना, और उसको ज़िन्दगी भर निष्ठा पूर्वक निभाना कोई मजाक बात नहीं है वह भी पार्टी को चंदा दिए बगैर ,ना जाने अब तक कितने पापड़,उन्होंने टिकट लेने के लिए बेले होंगे। पर अब नेता जी प्रसन्न हैं आज उनको उनके जन्मदिन के अवसर पर पार्टी की तरफ से जन्मदिन का उपहार जो मिल गया है। यानी की उनको उनके ही क्षेत्र से टिकट जो मिल गया है। उनके समर्थकों का जोश देखने लायक था। कार्यकर्ताओं के जय घोष ने मानों उनको विजयी घोषित कर दिया हो। और नेता जी बड़े खुश हैं मानों उनकी बरसों की तपस्या सफल हो गयी हो ।

(पंकज जोशी) सर्वाधिकारसुरक्षित ।
लखनऊ । उ०प्र०

१८/०१/२०१५

Saturday, 17 January 2015

लघुकथा:- संकल्प
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ठाकुर गजेंद्र के घर आज खूब चहल पहल है,उनकी नन्ही परी की आज शादी है ।कल तक जो लड़की छुटकी थी आज वही खूबसूरत नैन नक्श, कटीली आँखों , उभरते हुए वक्ष मानों कली फूल मे परिवर्तित होने वाली हो, सुन्दर नवयुवती का रूप धारण कर चुकी है। किसी भी लड़की के लिए मायके छोड़ कर ससुराल जाना दुखद हो सकता है परन्तु वहीं अपने प्रिय से मिलन की अभिलाषा का सुखद अनुभव उसके अंदर तड़प भी पैदा करता है। मुकुल जिसका सुषमा के घर शुरू से ही आना जाना था । अपने दिल की बात वह आज तक जुबां पर लाने की हिम्मत नहीं जुटा पाया। वह सुषमा से बेहद प्यार करता था। और उसका अपना चलता हुआ बिज़नेस भी है उससे अच्छी खासी आमदनी होती है । वह ठाकुर के स्वभाव से भी परिचित था । जाति-पंथ , समाज रसूख यह सब ठाकुर साहब के लिए काफी मायने रखते हैं । ठाकुर साहब ने अपनी इकलौती लड़की की शादी एक खाते पीते घर मे तय की है । लड़का आइ०ए०एस है और उसकी अभी नई नई पोस्टिंग हुई है। बारात घर पर पहुँचती है और मुकुल अपने दोस्तों के साथ बारातियों के स्वागत सत्कार में लग जाता है । जयमाला का कार्यक्रम समाप्त हो चुका है और फेरे शुरू होने वाले हैं । उधर दोनों समधियों के बीच ठीक-ठाक लेन देन भी हो चुका है। एक लड़की की सरे आम बोली लगाई जा चुकी थी, सुषमा आज नीलाम हो चुकी है । तभी लड़के के माँ बाप दौड़ते हुए फेरे के मंडप में पहुँचे -ये शादी नहीं हो सकती चलो यहाँ से लड़के के पिता ने अपने आ०ई०एस० बेटे को मंडप छोड़ने का हुक्म दिया , जब ठाकुर गजेंद्र ने लड़के के पिता से इसका कारण जानना चाहा कि लेन-देन तो  भाई साहब सब आप की इच्छानुसार हुआ तो एक बाप की पगड़ी सरे आम क्यों उछाल रहे हैं । तभी लड़के की माँ पीछे से बोली आप हमसे कारण पूछ रहें है आपकी लड़की मनहूस है पैदा होते ही यह अपनी माँ को खा गयी और आज फेरे पड़े नहीं की मेरी बिटिया जो शादी मे आ रही थी उसका अभी -अभी एक्सीडेंट हो गया है पता नहीं किस हाल मे होगी हमारी बेटी । तो इसमें सुषमा का क्या दोष ठाकुर साहब ने कहा । पर लड़के वाले टस से मस नहीं हुए यह लड़की ही मनहूस है कह कर बारात वापस ले गये। खैर किस्मत का लिखा कौन बदल सकता है । कुछ दिनों बाद ठाकुर साहब को पता चलता है कि उसी लड़के की शादी किस दूसरे पैसे वाले घराने में कर दी गई है और किसी का एक्सीडेंट वगैरह नहीं हुआ था । सब मनगढंत था । ठाकुर इतने बड़ा झूठ बर्दाश्त नहीं कर पाये और उसी रात उनकी हार्ट अटैक से मौत हो गयी । कभी हंसी खुशी से भरा घर श्मशान में तब्दील हो चुका था । आज साल भर बीत चुका है ठाकुर साहब की मौत को और आज तक इसी उहापोह की स्थिति में फंसा पडा मुकुल सुषमा से अपने दिल की बात कहने का  दृण संकल्प लेकर के घर से निकल पड़ता है। आज वही मनहूस सुषमा , मुकुल के जीवन में, ख़ुशी की फुहार बन कर , बरस रही है ।
(पंकज जोशी) सर्वाधिकार सुरक्षित ।
लखनऊ ।  उ०प्र०

१७/०१/२०१५
लघुकथा :-दिलदार
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किशन सेठ की गिनती शहर के प्रतिष्ठित,नामी- गिरामी व्यक्तियों में होती है,जब सिद्धांत एक साल का बालक था तो उनकी पत्नी उमा की मृत्यु हो गयी थी। किशन सेठ ने दुबारा कभी शादी इसलिए नहीं की क्योंकि उन्हें डर था कि सौतेली माँ से शायद सिद्धान्त को सगी माँ की तरह प्यार ना मिले । इसीलिये उन्होंने सिद्धान्त को माँ व बाप दोनों का प्यार दिया । फिर भी जैसे-जैसे सिद्धान्त बड़ा होता गया उसको हमेशा, दिल के किसी कोने में , माँ की कमी सदा खलती । आज सिद्धान्त बालिग़ हो चुका है। अब वह अपने अच्छे बुरे का स्वयं ध्यान रखने लगा है। समय कब पंख लगा कर फुर्र हो जाता है पता ही नहीं चलता है । उसने वयस्कता की दहलीज मे कदम रखा ही था कि आज उसके पिता का भी देहांत हो गया। जो उसके नाते रिश्तेदार आये थे वे भी तेहरवीं की रसम पूरी होने के बाद अपने-अपने घर चले गये। अब आज सिद्धान्त अपने को अनाथ महसूस कर था । दिन भर उसको इतना बड़ा घर काटने को दौड़ता है। अतः उसने अपनी ही तरह से अनाथ,असहाय ,निर्धन , गरीब बच्चों का सहारा बनने का फैसला किया। और उसने अपने पुस्तैनी व्यवसाय को तिलांजलि दे दी और अनाथ असहाय गरीब बच्चों को पढ़ाने उनकी दो वक्त की रोटी का इंतजाम हो सके इसलिये उसने अपनी सारी प्रापर्टी को ट्रस्ट में कन्वर्ट कर दिया । आज सिद्धान्त अपने को अकेला महसूस नहीं करता अब उसका घर रोज बच्चों की चहल पहल से गूंजा व महका करता मानो जैसे रोज कोई उत्सव या त्यौहार का दिन हो । सिद्धान्त और गरीब बच्चे दोनों एक दूसरे के पर्यायवाची बन चुके हैं । सिद्धांत के इस त्याग व तपस्या से आज सारा शहर उसका प्रशंसक बन गया है । और उसके इसी त्याग के कारण लोग उसको प्यार से दिलदार सेठ के नाम से पुकारने लगे हैं ।


(पंकज जोशी) सर्वाधिकार सुरक्षित
लखनऊ । उ०प्र०
१६/०१/२०१५

Thursday, 15 January 2015

लघुकथा :- विधवा
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संध्या की उम्र लगभग सत्रह साल की रही होगी ,जब उसने पहली बार युनिवेर्सिटी मे दाखिला लिया था । पहली बार कालेज जाने का अनुभव , नवयुवक व नयुवतियों मे ,एक परिंदे का पिंजड़े की कैद से बाहर निकल उन्मुक्त हवाओं से बातें करने के समान होता है । शांतनु से उसकी पहली मुलाक़ात क्लास मे ही हुई थी। दोनों ने साथ-साथ ग्रेजुएशन की पढ़ाई पूरी की । शांतनु के हँसमुँख रवैये और प्रभावशाली वाक्पटुता से संध्या खुद बखुद अपने को उसके करीब जाने से रोक नहीं पायी । ग्रेजुएशन की पढ़ाई खत्म करने के बाद इत्तेफ़ाक़ से दोनों को बैंक में साथ-साथ नौकरी भी मिल गयी । अब तो दोनों की रोज मुलाक़ात होने लगी कभी आफिस की कैंटीन,या ऑफिस के बाद उसकी बाइक के पीछे बैठ कर नदिया किनारे जाना,तो कभी किसी पार्क या काफी शॉप में जाकर बैठना देर तक बातें करना ।ज़वानी का अल्लहड़पन होता ही ऐसा है कि सारा ज़माना गलत होता है बस हम सही होते है ।जवानी में पलता प्यार और दहलीज के बाहर पड़ा एक गलत कदम दुनिया के सामने आपको शर्मिंदा कर सकता हैं । ऐसा ही कुछ संध्या के साथ भी हुआ । जब उसको अपने गर्भवती होने का पता चला। शांतनु तो शादी के लिये राजी नहीं था। पर संध्या के काफी दबाव के बाद बड़ी मुश्किल से वह उसके साथ शादी करने के लिए राजी हुआ । शादी की सुहागरात के समय शांतनु का शराब के नशे मे चूर लड़खड़ाते हुये कमरे के अंदर आना संध्या को चौंका देता है कि क्या यह वही शांतनु है जिसको वह चार -पांच साल से जानती है ।जिसके प्यार में पागल हो कर उससे शादी की । संध्या की आँखों से आँसू गिरने लगे और उसने अपना चेहरा शर्म से दोनों घुटनों के बीच छुपा लिया और मन ही मन बुदबुदाने लगी इतनी बड़ी गलती उससे कैसे हो गयी । वह एक शराबी से प्यार करती रही जिसके लिए उसने अपना तन मन सब समर्पण कर दिया उसने उसे इतना बड़ा धोखा दिया। अब पछताने से क्या लाभ वह तो उसके बच्चे की माँ बनने वाली है । खैर इस घटना को भी भाग्य का लिखा मान कर उसने परिस्थिति से समझौता करने का निश्च्य किया । उसने शांतनु को सुधारने के कई प्रयास किये पर शांतनु कहाँ सुधरने वाला था । रोज रात को शराब पीकर आना और संध्या से लड़ना झगड़ना और अगली सुबह संध्या से माफ़ी माँगना कि आज के बाद वह शराब को हाथ नहीं लगायेगा । संध्या भी रोज भगवान से प्रार्थना करती कि उसके पति को कुसंग से निकाल दें उसको सदबुद्धि दे दें जिससे उसकी शराब छूट जाये । एक दिन ऑफिस में शांतनु को खून की काफी उल्टियां हुईं संध्या उसको डॉक्टर के पास ले गयी। डॉक्टर ने बताया कि लीवर काफी खराब हो चुका है अगर इसी रफ़्तार से वह शराब पीता रहा तो वह बहुत जल्दी इस दुनिया को अलविदा कह देगा। लगभग दो-तीन महीने तो शांतनु ने शराब को हाथ भी नहीं लगाया और उसके स्वास्थ्य मे काफी तेजी से सुधार होने लगा । अब वह भला चंगा होकर फिर से नौकरी पर जाने लगा । लेकिन अच्छी आदतें इतनी जल्दी कहाँ छूटती हैं । एक रात शांतनु फिर से शराब पीकर घर पहुंचा और घर पहुँचते ही उसको खून की उल्टियाँ होने लगी । जब तक संध्या उसको हॉस्पिटल लेकर पहुँचती तब तक रास्ते में ही उसकी गोद में उसने दम तोड़ दिया । सत्ताईस साल की कोमल संध्या के जीवन पर दुखो का पहाड़ टूट पड़ा था । वह अब अपने तीन साल के बेटे को लेकर अपने मायके आ गयी । ज़वान लड़की को विधवा देख कर उसके गम में संध्या के माता-पिता भी बहुत जल्दी ही स्वर्ग सिधार गये । अब उसकी ज़िन्दगी जीने का एकमात्र सहारा था तो उसका इकलौता लड़का जो माँ के अधिक लाड प्यार की वजह से ज़िद्दी होगया था । संध्या उसकी हर अनावश्यक इच्छा को पूरा करती। अपने बेटे की प्रत्येक इच्छा पूर्ति ने माँ को बेटे के प्यार में अँधा कर दिया था । और पिता की जगह जो संस्कार के बीज उसने अपने बेटे के अंदर रोपने चाहिये थे वो वह उसको नहीं दे पायी ।धीरे धीरे उसका लड़का कुसंगति का शिकार हो गया। अब उसका लड़का रोज शराब पीकर घर आने लगा है । आज संध्या रिटायर हो चुकी है । पर आज भी वह अपने बेटे से प्यार करती है और उसके पुत्र मोह ने उसे इस कदर अँधा बना दिया है कि वह आज भी उसकी अनावश्यक इच्छाओं की पूर्ति करती हैं । वह आज अपने लड़के को शराब पीने के लिये पैसे देती है ।
(पंकजजोशी) सर्वाधिकारसुरक्षित ।
लखनऊ ।उ०प्र०
१५/०१/२०१५


Wednesday, 14 January 2015

लघुकथा :मासूमियत

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उमा जैसी ही अपने पति के साथ कार से उतरी ही थी , रेस्त्रां के अंदर जाने के लिये , तभी एक भिखारिन ने पीछे से आवाज लगाई बाबू जी एक रुपया दे दो , भगवान के नाम पर एक रुपया दे दो , मेमसाब आपकी जोड़ी सलामत रहे आपके बाल बच्चे सुखी रहें खूब फलें फूले । फिर उसने गोदी में अपने बच्चे को उठाया और बोली मेमसाब एक बार रहम करो "देखो इसने कल से इसने कुछ नहीं खाया है । " उमा की शादी के आठ साल होने को आये थे आज तक उसकी गोद सूनी है ना जाने कितने मंदिर - दरगाहों पर दोनों पति पत्नी ने जाकर मत्थे टेके होंगें ।पर सब व्यर्थ वह आज तक माँ नहीं बन पाई थी । रेस्त्रां के अंदर जाते समय भिखारिन के बच्चे ने नादानी में पीछे से उमा का पल्लू पकड़ लिया उमा चौंकी जैसे ही उसने पलट के देखा तो उसके अंदर का ममत्व हिलोरें लेने लगा । उसने तुरंत अपना पर्स खोला और चॉकलेट के कुछ पैकेट बच्चे के हाथ में थमा दिए और चुपचाप अपने पल्लू से चश्मे के अंदर झरते हुए आँखों के कोरों से बहते हुए आंसूओं को पोछ कर रेस्त्रां के अंदर जाने लगी भूख से तड़पते हुए बच्चे की आँखें ख़ुशी से चमक उठी और बड़ी मॉसूमियत से बोला अम्मा देखो यह क्या है ?
(पंकज जोशी) सर्वाधिकार सुरक्षित ।
लखनऊ । उ०प्र०
१४ /०१/२०१५
लघुकथा :-नास्तिक
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सुमन एक मध्यम वर्गीय परिवार से ताल्लुक रखती है। बचपन से ही वह आस्तिक थी।हर कार्य को करने से पहले अपने कृष्ण कन्हैया की मूर्ति के सामने दो पर्ची डाल देती एक हाँ की और एक ना वाली और मन ही मन उनसे प्रार्थना करती कि हे मेरे कान्हा अगर यह कार्य मेरे लिये उत्तम और उचित हो तो हाँ वाली पर्ची ही मुझसे निकलवाना और उसे हमेशा ही , जो पर्ची वह निकाल कर खोलती तो वह हाँ की ही होती,बचपन से आज तक उसे अपने कान्हा से मन चाही मुरादे प्राप्त होती आईं थी । आज सुमन अपनी उम्र के आखिरी पड़ाव मे है मगर अब वह अपने लड्डू गोपाल से प्रश्न नहीं पूछती कोई समाधान नही मांगती। अब उसका कन्हैया उसके लिये निष्ठुर हो गया है । कारण, कारण बहुत ही साधारण है कि कुछ वर्ष पूर्व उसके बेटे का एक्सिडेंट हो गया था। और वह हस्पताल में ज़िन्दगी और मौत के लिए संघर्ष कर रहा था। एक माँ का दिल ही तो था क्या गलत किया था उसने अगर प्रश्न पूछने के लिए दो पर्ची उसने अपने कान्हा के चरणों में डालते हुए बस इतना ही तो पूछा था कि उसके लाड़ले की जान बचेगी या नहीं , बस यहीं पर उसकी सारी तपस्या भंग हो गयी । उसका अपने कान्हा के प्रति प्रेम नफरत मे बदल गया। क्योंकि इस बार उसके द्वारा डाली गयी पर्ची में हर बार की तरह हाँ की नहीं निकली , इस बार उसके कान्हा का उत्तर ना था। उसका बेटा इस दुनिया को छोड़ कर जा चुका था। वह दिन और आज का दिन सुमन के घर में अब उसके प्यारे कृष्ण कन्हैया की मूर्ति नहीं है , उसके मन का मंदिर आहत और वीरान हो चला है ।पर्ची सिस्टम अब पूर्णतः बंद हो चुका है। क्या सुमन की आस्था और विश्वास की दीवार इतनी कमजोर थी कि एक दुःख का झटका लगने मात्र से ही वह भरभरा कर गिर गयी। एक ठेस ने उसे आस्तिक से नास्तिक बना दिया । क्या उसे भगवान से हमेशा हाँ का ही उत्तर मिलना जरूरी था ? क्या उसका अपने कान्हा के प्रति प्रेम में कुछ कमी थी ? या भक्त वत्सल कान्हा द्वारा ली , अपने भक्त के प्रति समर्पण की परीक्षा थी यह ।
(पंकज जोशी ) सर्वाधिकार सुरक्षित ।
लखनऊ। उ०प्र०
१३/०१/२०१५
लघुकथा:- मनहूस कौन
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करिश्मा की माँ का उसको जन्म देने पश्चात ही स्वर्ग वास हो गया था । घर मे उसको सभी मनहूस समझते थे। उसके पिता ने भी दूसरी शादी कर ली थी । वक्त के साथ ही करिश्मा ने अपनी पढाई पूरी कर आज वह एक प्राइवेट फर्म मे नौकरी कर अपने पिता के रिटायर मेंट के बाद अपने पूरे परिवार के भरण पोषण का जिम्मा अपने कंधो पर उठा लिया । उसका सौतेला भाई रोज नशे में लिप्त दिन भर रोड इंस्पेक्टरी करता और रात मे घर मे बवाल काटता । जो सौतेली माँ उसको बचपन मे एक-एक दाने के लिए तरसाती थी आज करिश्मा ने बीमारी में ना केवल उसका हस्पताल मे इलाज करवाया बल्कि अपनी सौतेली माँ को अपना रक्त दान देकर अपने सौतेले भाई के सिर पर से माँ का साया उठने से भी बचा लिया । आज उसका पिता का सिर शर्म से झुका अपने आप से प्रश्न कर रहा है मनहूस कौन ।
पंकज जोशी ) सर्वाधिकारसुरक्षित ।
लखनऊ । उ०प्र०
13/01/2014