Monday, 30 March 2015

देखा - देखी 
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शहर की चमक दमक दिखला कर बेवकूफ बना दिया उसने तुझे , मैं तो पहले ही कहती थी कि श्याम की बात में मत विश्वास कर , पर तुमने एक ना सुनी , गाँव की अच्छी भली खेती बाड़ी को छोड़ शहर चले आये। न रहने को छत है ना ठीक से खाना पीना , क्या काम दिलाया उसने कहता था शहर में बढ़िया नौकरी दिलवाएगा , यह पीठ पर सीमेंट की बोरी और सिर पर ईंटों का ढेर । बुधिया की आँखों से झरती आंसुओं की धारा मानो उसकी हँसी उड़ा रही हो कि "दूर के ढोल सुहावने होते हैं "

(पंकज जोशी ) सर्वधिकार सुरक्षित 
लखनऊ   प्र

30/03/2015
आईना
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तुम कौन ? मैंने तुम्हे पहचाना नही, मैं तुम्हारा बीता हुआ कल हूँ। मेरा काम ही लोंगो को उनका असली चेहरा दिखाना है आज से पैंतीस साल पहले तुम्हारे द्वारा किये गए जुर्मों से तो कोर्ट ने तुम्हें बरी कर दिया । पर मेरी अदालत में तुम आज भी गुनहगार हो ।

(पंकज जोशी ) सर्वाधिकार सुरक्षित
लखनऊ   उ प्र

30/03/2015

Monday, 23 March 2015

लघु कथा :- औलाद 
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दृश्य १) आज से पच्चीस वर्ष पूर्व रमेश ने राधा को चरित्रहीन समझ कर  अपने घर से निकाल दिया था . उस समय राधा पेट से थी बाद में उसने अपने ही ऑफिस की लड़की उर्वशी से शादी कर ली
दृश्य २) राधा ने इसे ईश्वर की इच्छा मान कर लोंगों के कपडे सी कर अपने लाडले बेटे को खूब लिखाया पढ़ाया और उसे काबिल ऑफिसर बनाया . राधा ने खूब धूमधाम से उसकी शादी की , आज उसके लड़के का भरापूरा परिवार है , वह  अब दो बच्चों की दादी बन चुकी है

दृश्य ३) तीर्थ यात्रा पर आज पुरा परिवार हरिद्वार जा रहा है , स्टेशन  पर सामान रख कर ट्रेन का इन्तजार कर रही राधा की नजर ठण्ड से कांपते हुए रमेश पर पड़ती है पास जा कर पूछती है आप ,यहाँ अकेले  कहाँ जा रहे हैं ? रमेश ने राधा को तुरंत पहचान लिया और उससे अपने पिछले कर्मों की माफ़ी मांगने लगा .बात करने से पता चला कि उसकी दूसरी बीबी की मौत के बाद उसकी अपनी औलादों ने उसे घर से निकाल  दिया है

दृश्य ४ ) बेटा इधर आओ इनके पैर छुओ यह तुम्हारे पिता जी हैं बहुत समय पहले एक दुखद दुर्घटना में यह हमसे बिछड  गए थे , चलो अब घर चलते हैं आइये आप भी चलिए , पर मैं कैसे चल सकता हूँ ? तुम्हारे साथ रमेश ने कहा क्यों नहीं  क्या अपने घर जाने के लिए पूछना पड़ता है ? , “बेटा गाड़ी बुलवाओ” पर माँ तीर्थ यात्रा बेटे ने कहा, राधा ने प्रत्युतर दिया  - मेरी तीर्थ यात्रा आज पूरी हो गई

(पंकज जोशी ) सर्वाधिकार सुरक्षित ।
लखनऊ। उ०प्र०
23/03/2015



Thursday, 19 March 2015

लघुकथा :- आधुनिक लेखिका
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दृश्य 1) नई जगह तबादला हुए पन्द्रह दिन ही हुए होंगें , पति उच्च पद पर तैनात एक सरकारी अधिकारी हैं । बच्चों के स्कूल और पति देव के ऑफिस चले जाने के बाद वह घर पर अकेली रह जाती थी यूँ तो उसके घर पर नौकरों चाकरों का तांता लगा रहता है । पर समय कैसे कटे उसका , टी वी खोलती तो वही घिसे पिटे सास बहू के सीरियल या फिर बलात्कार से पटी ख़बरें , गुस्से से टीवी का रिमोट उठाया और स्विच ऑफ ।
उसके लिये किसी के पास समय नहीं था  । धीरे धीरे वह अवसाद से ग्रसित हुई जा रही थी ।

दृश्य 2) घर पर खाली बैठे बैठे यूँ ही उसे ख़याल आया चलो कुछ ना सही तो आज कुछ दिमाग की कसरत ही की जाय सुडूको या क्रॉसवर्ड खेल कर , हाथ में उसने गर्मागर्म ग्रीन टी का प्याला और हाथ में अखबार लिये रॉकिंग चेयर पर बैठ गई । कुछ ही देर के बाद, उसके हाथ सुडोकू को छोड़ अखबार के कागजों में शब्द उकेरने लगे अरे यह क्या यह तो कहानी बन गई ।अब उसको नया मकसद मिल गया था जीवन को नए सिरे से जीने का अब जब कभी वह खाली होती तो लिखने बैठ जाती । अब वह कलम की सिपाही हो गई है ।
दृश्य 3) कल तक अवसाद में रहने वाली इस औरत की कहानियां बड़े बड़े अखबारों में बदले हुए नामों के साथ प्रकाशित होने लगी । अब उसके पति देव उसी के द्वारा रचित कहानियों को उसे ही पढ़ कर सुनाया करते और लेखिका की तारीफों के पुल बांधते और वह मन ही मन मुस्काती ।
दृश्य 4) आज उसी के द्वारा लिखे उपनन्यास का आज विमोचन है , तय समयानुसार उसको पहुंचना है । हाल खचाखच भरा हुआ है । स्टेज में मंत्री जी के साथ उसके पतिदेव भी बैठे हैं । माइक पर से पुस्तक की लेखिका अनामिका को उनके उपनन्यास 'आधुनिक लेखिका' के विमोचन के लिये मंच पर आने के लिए आग्रह किया जाता है । जैसे ही वह मंच पर अपना आसन ग्रहण करने के लिये सीढ़ियां चढ़ती है पूरा हाल तालियों की गड़गड़ाहट से गुंजाय मान हो जाता है । उसके पति देव अपनी सीट छोड़ कर खड़े हो जाते है, नवोदित लेखिका के सम्मान में ।
(पंकज जोशी) सर्वाधिकार सुरक्षित ।
लखनऊ । उ०प्र०
18/03/2015



लघु कथा :- रिश्ते
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दृश्य 1:-सुबह उसने बोला भैय्या मुझे स्वाइन फ्लू का डर है ,टेस्ट कराने पी .जी.आईं जाना है एक घण्टे में आ जाऊँगा.आपकी गाडी ले जा सकता हूँ क्या ? मेरे पास आज गाडी नहीं है। मैंने कहा ले जाओ ।

दृश्य 2:-शाम को ऑफिस से लौटते वक़्त देखा कि वह गाडी को स्टार्ट कर रहा है , भाई क्या हुआ गाड़ी नहीं चल रही क्या ? पड़ोस के एक और भाई साहब अस्थाना जी भी उसके साथ थे। वह बंदा मुझे देख कर बोला भैय्या डॉक्टर से बात की वह कह रहे हैं कि रिपोर्ट पॉजिटिव है तुरंत आओ ,मुझे घबराहट हो रही है क्या ?आप मेरे साथ हॉस्पिटल चले चलेंगे ? मैंने कहा चलो ।
दृश्य 3:- खैर हॉस्पिटल से रिपोर्ट ली और दवाखाने पहुंचें साथ में अस्थाना भाईसाहब भी थे जिनकी गाडी वह ले करके आया था । डॉक्टर ने पेसेंट को दूर खड़ा कर दिया और हमको अंदर बुला कर सरकारी प्रक्रिया पूरी करने लगा और रिपोर्ट फ़ाइल में लगाते हुए कहा , आप अपना यहां नाम पता और मरीज से क्या रिश्ता है लिखें ,
दृश्य 4:-मेरे मुहँ से निकल गया भई हम तो पडोसी हैं और इसके भाई व बहन तो सब बाहर हैं हमीं इनको लेकर यहाँ आएं हैं । तभी साथ वाले अस्थाना भाईसाहब बोले मैं इसका बड़ा भाई हूँ लाओ कहाँ रजिस्टर में दस्तखत करने हैं । मैं अवाक उनका मुँह ताकता रह गया ।
(पंकज जोशी) सर्वाधिकार सुरक्षित ।
लखनऊ । उ०प्र०
16/03/2015


Sunday, 15 March 2015

लघुकथा :-  उद्धार
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शालू शालू यह क्या तुम यहाँ कैसे और यह क्या तुम्हारे पैरों में जंजीरे और तुम्हारे कपड़े तार तार क्यों है ? क्या इन बदमाशों ने क्या तुम्हारी इज्जत लूटी ? अनिल ने एक ही साँस में सारे प्रश्न पूछना चाहा। तुम यहाँ अनिल शालू ने उलटे उससे पूछा।

अरे यह तो हमारा रोज का काम है । डिपार्टमेंट को पहले से ही शक था कि एक गिरोह शहर में सक्रिय है जो लड़कियों को पहले नशे की लत लगाते हैं और जब वह उनके चंगुल में फंस जाती हैं तो उनको देश के बाहर बेच देते है । अनिल ने प्रत्युत्तर दिया।काश मैंनें अपने माँ बाप की बात मान लेती और आम घरेलू लड़कियों की तरह रहती अनिल। पर मैं तो चुपचाप अमित की चिकनी चुपड़ी बातों मे आकर उसके साथ रेव पार्टी में चली गई , वहां क्या हुआ यह मुझे याद नहीं पर उसके बाद जब होश आया तो मैंने खुद को यहाँ कैद पाया ,घर वालों को भी नहीं बताया । अनिल तुम तो मेरे बचपन के दोस्त हो , तुम पुलिस में हो कुछ तो करो प्लीज अनिल शालू बोलती रही और आँखों से बहती अश्रु की धार उसके पछतावे की ओर ईशारा कर रही थी।

ठीक है तुम यहाँ चुपचाप जैसी पड़ी हो वैसे ही पड़ी रहो। कह कर अनिल वहाँ से चला गया।
कुछ देर बाद पुलिस की रेड उस तहखाने में पड़ी जहाँ शालू जैसी कई अन्य लड़कियाँ कैद थी। अमित जो शालू को फुसला कर ले गया था। उसको भी पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया।
इस घटना के बाद घर वालों ने शालू को अपनाना तो दूर उसे पहचानने से इंकार कर दिया। कोर्ट ने उसको महिला सुधार गृह भेजने का आदेश दे दिया।
सुधार गृह से छूटने के बाद शालू के पास ना कोई छत थी नाहीं सर पर हाथ रखने वाला कोई अपना बड़ा उस समय अनिल ने उसका हाथ मांगते हुए कहा "शालू मैं भी अनाथ हूँ और तुम्हारे अपने होते हुए भी आज तुम्हारा कोई नहीं है , क्यों ना हम एक दूसरे का सहारा बन जायें "

शालू ने नजरे जमीन पर गड़ाते हुए कहा कि इतना सब कुछ हो जाने के बाद भी अनिल तुम मुझे अपनाने को तैय्यार हो। "पगली मैं तो बचपन से ही तुमसे प्यार करता था पर तुम्हारे और मेरे बीच दौलत की दीवार जो थी सो मन की बात मन मे ही रह गई थी। "

अनिल की बातें सुन कर शालू ने उसके कंधे पर अपना सिर रख दिया और फफक कर रो पड़ी यह आँसू उसके अनिल के प्रति कृतज्ञता के थे जिसने उसको नवजीवन दे कर उसका उद्धार किया ।
(पंकज जोशी) सर्वाधिकार सुरक्षित ।
लखनऊ । उ०प्र०

15/03/2015



लघुकथा :- स्टिंग ऑपरेशन
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उनका शहर में बहुत बड़ा नाम था , सोशलाइट जो थीं वह , बिना उनके हर महफ़िल बेकार थी। खुद को उन्होंने गरीबों का मसीहा जो बनाया था , चाहे पार्टी स्तर पर धरना प्रदर्शन हो , नशा उन्मूलन हो , महिला मुक्ति की बात या यौन उत्पीड़न हर क्षेत्र में उनकी बुलंद आवाज आम जनता को झकझोर देती थी ।

पर आज अचानक ऐसा क्या हुआ जो टीवी चैनल में उनके नाम के चर्चे आमोखास हो गये । आज मामला दूसरा है , बाजी पलट गई ,पांसे आज उल्टे पड़ गए हैं ,एक स्टिंग ऑपरेशन ने उनको देश की अपह्रत और सरहद पार से लाई गई मासूम लड़कियों के सौदागर के रूप में उन्हें अपने कैमरे में कैद कर लिया था ।
आज कोर्ट की पेशी के दौरान अपने भाषणों में महिलाओं की हमदर्द , सिंहनी के रूप में दहाड़ने वाली बहरूपिये को आज अपना चेहरा दुप्पट्टे से ढँकना पड़ रहा है , कचहरी के बाहर खड़ी पुलिस वैन उसको हवालात की सैर कराने के लिये तैय्यार है ।
(पंकज जोशी) सर्वाधिकार सुरक्षित ।

लखनऊ । उ०प्र०
15/03/2015
लघुकथा :- खाप पंचायत
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कमसिन उम्र की अमीना का विवाह इशरत के साथ करीब आठ साल पहले हुआ था । भरा पूरा घर था सास ससुर व एक ननद भी थी जिसकी दो साल पहले ही शादी हुई थी । बहन की शादी के बाद माँ की देख भाल करने के लिये वह अमीना को गाँव छोड़ वापस शहर चला आया । पिछले साल माँ की अकस्मात् मौत के बाद वह अकेले शहर चला आया कि अच्छा घर मिलते ही वह गाँव की जमीन जायदाद को बेच कर अमीना और अब्बा को लेकर शहर ही बस जायेगा ।

एक दिन अमीना का फ़ोन उसके पास आया और उसने उससे तुरंत गाँव आने को कहा । वापस गाँव लौटने पर उसने रो रो कर अपने साथ उसके बाप द्वारा ढाये गये शारीरिक व मानसिक उत्पीड़न को तबसीर से बताया । पीठ पर पड़े चोट के नीले निशान और ऊपर से उसके माँ बनने की बात सुन कर इशरत की आँखों में खून उत्तर आया ।
मामला पुलिस में दर्ज हुआ और कड़ाई से पूछताछ के बाद उसके बाप द्वारा अमीना का उसके द्वारा शारीरिक यौन उत्पीड़न व उसके पेट में बच्चा पलने की बात स्वीकार की ।
मामले को रफादफा करने के लिये गाँव वालों ने अगले ही दिन खाप पंचायत बैठा दी । और पंचायत ने अपना नायाब फैसला सुना दिया कि इशरत ने अमीना को तलाक देना होगा और उसकी शादी उसके बाप से करा दी जाय ।
खाप के फैसले के बाद अब अमीना इशरत की माँ हो गई और उसका नवजात शिशु अब उसका भाई है ।
(पंकज जोशी) सर्वाधिकार सुरक्षित ।
लखनऊ । उ०प्र०
13/03/2015
लघुकथा :- गठ बंधन
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सिद्धान्त ने इंनजीयरिंग की पढ़ाई करने के लिए कालेज में दाखिला लिया । और जैसा हर कालेज ,स्कूल ऑफिस में देखा जाता है कि अक्सर दो ग्रुप बन जाते है । पर यहाँ तो उसका साथ देने वालों में कोई था ही नहीं सभी लड़के लड़कियां बड़े ही सम्भ्रान्त घरों से थे फर्राटे दार अंग्रेजी बोलने वाले ।

सिद्धांत के पिता एक मेडिकल स्टोर में मामूली से कर्मचारी थे । अतः सिद्धांत का सीधा साधा रहन सहन उन अमीर घराने के बच्चों के गले के नीचे नहीं उतरता था ।
सिद्धांत ने अपनी प्रतिभा के दम पर कालेज में एडमिशन लिया था । पहला सेमेस्टर का एग्जाम ख़त्म हुआ । सर्वोच्च अंक उसके खाते में आये । अब तो उसके शिक्षक भी उसकी विद्वता के मुरीद हो गए । कालेज के छात्र इसे मात्र एक इत्तेफ़ाक़ समझते रहे । पर जब दूसरे और तीसरे समेस्टर मे भी उसको सर्वोच्च अंक मिले ।
तो वही साथी जो कल तक उसके कपड़ो का उसके रहन सहन का मजाक बनाते थे । अब अपने पुराने गठ बंधन को सहर्ष छोड़ उसके साथ मित्रता करने की होड़ में लग गये ।

(पंकज जोशी) सर्वाधिकार सुरक्षित ।
लखनऊ । उ०प्र०
13/03/2015

Wednesday, 11 March 2015

लघुकथा:-बदलते चेहरे
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मनीषा
एक साधारण नैन नक्श वाली , एक गरीब परिवार की लड़की , जिसका विवाह उच्चकुलीन परिवार के लड़के रमेश के साथ हुआ , जो अपनी बूढ़ी माँ के साथ एक आलिशान घर मे रहता है ।
रमेश के घर पर मानो कोई बुरा साया छाया हुआ था पहले उसके पिता बाद में उसके भाई व बहन की अचानक हुई मृत्यु ने घर पर मनहूसियत के चिन्ह मानो अपने पीछे छोड़ रखे हों ।
मनीषा के पाँव पड़ते ही पूरे घर का काया कल्प ही हो गया था । पूरे घर पर उसके गुणों की सुंदरता ने अपना जादू बिखेर दिया था । उसके गुणों ने मनहूसियत के ग्रहण पर आशा की किरणें फैला सी दी थीं ।
जो सास अपने पति और बच्चों के गुज़र जाने के बाद पूरी तरह अवसाद ग्रसित हो चुकी थी उसको मानो उड़ने के लिये पर मिल गये हो और वह पुनः जीना चाहती थी ।
घर की स्याह मनहूसियत की दीवारें आज मानो रंगीन हो उठी हो , चमकने लगी है । सभी के चेहरों पर प्रसन्नता के भाव, गुलाब के फूल के मानिंद खिल से रहे हों ।
एक नई सुबह नई आशा की किरणों के साथ बदलते चेहरे ।
(पंकज जोशी) सर्वाधिकार सुरक्षित ।
लखनऊ । उ०प्र०
12/03/2015


लघुकथा :-  मधुशाला
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रवि एक छोटे से गाँव से दस साल पहले शहर नौकरी ढूंढने आया था । पिता जी उसके पुरोहित थे तो उसको रामायण और गीता के कुछ अंश कंठस्थ थे । और वह उनका अनुपालन भी करता आया था । पर शहर की आबोहवा उसके कट्टर धार्मिक विचारों के बीच रोड़े का कार्य कर रही थी । जितनी भी नौकरी उसे मिली तो सहकर्मियों से सही ताल मेल ना बैठा ना पाने के कारण वह छूट जाती ।

एक दिन वह निराश थक हार कर वापस गाँव जाने के लिये रेलवे स्टेशन पर अपनी गाडी आने का इंतज़ार कर रहा था , जो नियत समय से काफी लेट थी । तभी उसकी नज़र बुक स्टाल पर बच्चन जी की मधुशाला पर पड़ी उसने पुस्तक खरीदी और उसे तन्मयता से पढ़ने लगा। पुस्तक की एक लाइन उसको जँच गई " एक राह तू चला चला चल तो पा जाऐगा मधुशाला " । जो अर्थ गीता और रामायण की पंक्तिया रवि को ना समझा पाई वह उसको मधुशाला ने समझा दिया ।
रवि ने पुस्तक अपने बैग में डाली और वापस शहर की तरफ रुख कर लिया एक नई उमंग और उत्साह के साथ। आज मधुशाला सार्थक हो गई ।
(पंकज जोशी) सर्वाधिकार सुरक्षित ।
लखनऊ । उ०प्र०
12/03/2015


Monday, 9 March 2015

लघु कथा :-धोखा (पार्ट 2)
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अमित को माँ के गुज़र जाने के बाद अकेलेपन का अहसास ना हो इसलिये संभावना उसके साथ ही रहने लगी थी।

एक दिन अमित को बिजनेस के सिलसिले में बाहर जाना पड़ता है। काम खत्म कर वह संभावना से मिलने की तड़प में जल्दी घर लौट आता है।
घर पर उसको रोशन के कमरे से संभावना के हँसने की आवाज सुनाई पड़ती है और वह दबे पाँव रोशन के कमरे के अधखुले दरवाजे से जो देखता है .................उससे वह बुरी तरह टूट जाता है।
अपने कमरे की अलमारी खोल उससे कुछ निकालता है और अंदर से कमरा बंद कर लेता है।

कुछ मिनट बाद उसके कमरे से धाँय की आवाज आती है ।
दरवाजे से उसका खून रिस कर बाहर बह रहा होता है । सम्भावना के क़दमों तले।


(पंकज जोशी) सर्वाधिकार सुरक्षित

लखनऊ । उ०प्र०
19/02/2015
लघुकथा :- फैशन
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गरीबी से उठ कर बड़े हुये अमीर बाप की इकलौती बिटिया की कहानी है ।उसके शॉपिंग मॉल में घुसते ही ऊपर से नीचे शोरूम सभी कर्मचारी मुस्तैद हो जाते थे।वह जिस भी दुकान पर रूकती और जिस भी ड्रेस पर हाथ रखती वह उसकी हो जाती । कुल मिला कर वह फैशन परस्त थी ।

बड़ी हो कर उसने माया नागरी की ओर रुख किया और उसके कदम पड़ते ही उसकी खूबसूरती ने फैशन जगत में तहलका ही मचा दिया ।
धीरे धीरे उसे फ़िल्म इन्डस्ट्रीज में रोल मिलने लगा। और एक बाद एक सफल फिल्में देने के बाद अचानक वह सिल्वर स्क्रीन से गुमनामी के अँधेरे में गायब हो गयी। और अपने पीछे छोड़ गई एक बड़ा सा शून्य ,एक रिक्त स्थान जो सदा के लिए अपने प्रशंषको के मानस पटल प्रश्न चिन्ह छोड़ गई , आखिर कब , कहाँ और क्यों ?
(पंकज जोशी) सर्वाधिकारसुरक्षित ।
लखनऊ । उ०प्र०
09/03/2015