Friday, 24 July 2015

नुक्कड़ नाटक
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शहर के व्यस्तम इलाके के बड़े चौराहे पर मजमा लगा था । लोग उचक उचक कर देख रहे थे कि क्या हो रहा है । बड़ी भीड़ को चीरता हुआ अंदर प्रवेश किया तो देखा ' निर्भया ' को लोग इंसाफ दिलाती एक मण्डली नुक्कड़ नाटक खेल रही है।


गले में तख्ती लटकाये कुछ युवक और युवतियां अपनी बारी के इन्तेजार के बाद डायलॉग बोलते और लोग उस पर तालियां बजाते।

 "अरे आखिर कब तक यह जुल्म हम सहते रहेंगे -क्या दुनिया में इन्साफ की कोई जगह नहीं"

तभी भीड़ से एक आवाज आई "जब इतने छोटे टाइट कपडे पहनोगी तो कुछ नही बहुत कुछ होगा ।"

मात्र पन्द्रह मिनट के बाद नाटक खत्म होने ही वाला था कि तभी किसी ने एक लड़की को धक्का दिया और वह सड़क पर गिर गई ।

 ताली बजाते लोगों की निगाहे गिद्ध की भांति उसके शरीर को ताक रही थी । 

नाटक खेलने वाले और देखने वाले बुत की तरह , मौन धारण किये अपने अपने घरों को चल दिए ।

निर्भया को इन्साफ  मिल चुका था ।

( पंकज जोशी ) सर्वाधिकार सुरक्षित ।

लखनऊ । उ. प्र

24/07/2015

Tuesday, 21 July 2015

तहजीब -1
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" कोई मुझ बूढे अंधे , को सड़क पार करा दो बड़ा अहसान होगा "  फकीर राहगीरों से मदद मांग रहा था ।

कालेज अभी अभी छूटा था , तभी दो लड़के उसके पास पहुंचे उसका हाथ पकड़ा और सड़क पार कराने की जगह उसको बीच भरे चौराहे पर ले जाकर खड़ा कर दिया ।

" भगवान तुम्हारा भला करे बच्चों -जुग जुग जियो "

" हमारी नहीं अपनी चिंता करो  अब बैठो यही और  मरो ।" लड़के हंसने लगे

तभी एक  कार रुकी उसमे से एक महिला उतरी और उनमे से एक लड़के के गाल पर  झन्नाटेदार तमाचा रसीद दिया ।उसके बाद उसने बड़े सलीके को बुजुर्ग को गाडी में बिठाकर  वृद्धाश्रम  छोड़कर आते वक्त उसकी नम  आँखों में  अपने भूलों की दास्तान उभर कर आ चुकी थी । प्रायश्चित नामुमकिन था ।

( पंकज जोशी ) सर्वाधिकार सुरक्षित ।

लखनऊ । उ.प्र

21/07/2015
तहजीब
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आज मेरी कलम , दवात और स्याही मेरा साथ छोड़ कर जाना चाहती है । वे सभी अपने को एक दूसरे से काबिल समझ रही हैं " पर क्या तुम लोगों को इस बात का आभास है कि बिना मेरी उँगलियों के सहारे तुम अस्तित्व हीन हो ! "

" किस अस्तित्व की तुम बात करते हो कागज बोला अगर मैं ना हूँ तो तुम अपनी भावनाओ को उकेरोगे किसमे" फिर पीछे से स्याही की आवाज आई " अगर में रोशनाई ना बिखेरूं तो लोग कागज और तुम क्या ख़ाक पढ़ेंगे " 

इतनी देर से चुप कलम जो अब तक चुप्पी साधी हुई थी उसकी आँखों से अंगारे मानो बरस रहे थे ।
अगर मैं ना होता तो तुम्हारी ,रोशनाई ,कागज और यह लेखक सब बेकार थे । 

 सभी अपने अपने क्षेत्र के माने हुए पुरोधा थे जो किसी भी तरीके से एक दूसरे के सामने झुकने को तैयार नहीं थे।

तभी तेज बारिश लिये अंधड़ आया और लेखक के मनोभावों को जो उसने रोशनाई और कलम के साथ कागज पर उकेरे थे दूर उड़ाता ले गया । 

तहजीब बारिश के पानी घुल कर प्रकृति में रच बस चुकी थी ।

( पंकज जोशी ) सर्वाधिकार सुरक्षित ।

लखनऊ । उ.प्र

21/07/2015

Wednesday, 15 July 2015

बरसात 
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मॉनसून का मौसम इस वर्ष भी ना के बराबर ही रहा प्रदेश में , तेज चटक धूप ने धरती को चीर कर रख दिया था , भूमि बंजर हो गई थी । ठीक वही हालात अनन्या के भी थे ।
छोटी उम्र में शादी , दूसरे दिन पति के स्वर्गवास होने का दंश भी ससुराल वालों ने उसके मत्थे मड़ दिया । बापू आये और बिटिया को वापस घर ले गये ।
कुछ ही वर्षों में बिटिया के वैधव्य के गम में पिता भी चल बसे । घर का सारा बोझ उसने अपने कन्धे पर ले लिया ।
एक बार सावन में अपनी सखियों के साथ बारिश में भीग क्या गई रिश्तेदारी में मानो भूचाल सा गया । सभी ने उसकी माँ और भाइयों को चेताया कि उसके इस व्यवहार से समाज की और लड़कियों पर बुरा असर पड़ेगा तो बस माँ ने उसे कोठरी में बन्द कर दिया।
" माँ का मेरा क्या कसूर है क्या पूरी ज़िन्दगी भर सावन मेरे लिए अभिशप्त रहेगा " कोठरी से अनन्या चिल्लाई ।
हर वर्ष की तरह आज भी उम्र के आखरी पड़ाव में वह पथराई आँखों से अपने जीवन उन काले मेघो का बेसब्री से इन्तेजार करती है ।
बादल आते और बिना बरसे ही उड़ जाते , माई घर चलो कब तक यहाँ बैठी रहोगी ? पीछे पलट कर देखा तो घर का नौकर उससे चलने के लिये कह रहा था ।
निरुत्तर सी उसने अपना चश्मा पोछा और लाठी पकड़ कर ज्यों ही उठने को तैयार ही हुई थी कि आसमान में तेज कड़कदार बिजली कौंधी और झमाझम पानी ने पूरे उसके पूरे शरीर को भिगो दिया और वह निढाल होकर जो गिरी तो दुबारा ना उठ सकी । आज धरती बंजर नहीं थी ।

( पंकज जोशी ) सर्वाधिकार सुरक्षित ।
लखनऊ । उ. प्र.।
15/07/2015
मौलिक व अप्रकाशित ।

Wednesday, 8 July 2015

 वैधव्य
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कालेज में वह फेमस था , लड़कियां उसकी इक इक अदाओं पर मरती थी । आज फेयरवेल पार्टी थी , कामिनी उसकी सबसे अच्छी दोस्तों में से एक थी , कामिनी ने कागज का एक टुकड़े में कुछ लिखा और उसके कान में कुछ कहा ।

" यह क्या बेहूदा मजाक है उसने कागज के टुकड़े  टुकड़े कर हवा में उड़ा दिया ।

कुछ दिनों  उसको पता चला कि सुनील की एक्सीडेंट से मौत हो गई है ।

तब से उसने मौन  वैधव्य  धारण कर अपना जीवन उसके नाम कर दिया ।

( पंकज जोशी  ) सर्वाधिकार सुरक्षित ।

लखनऊ । उ.प्र

08/07/2015

Monday, 6 July 2015

पक्की नौकरी 
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द्वितीय विश्वयुद्ध को खत्म हुए 70 साल हो गए ! पर यह पठ्ठा है कि सुधरने का नाम ही नहीं लेता , सभी इसका स्वागत हेल हिटलर कहते हैं , कुछ तो इसको स्वर्ग का खुदा भी कहते हैं । 

 जीसस ! भी इसी का कहा मानते है । यहाँ भी तानाशाही स्टालिन ने चर्चिल से फुसफुसाते हुए कहा सामने टेबल के दूसरी ओर हिटलर और उसका सहयोगी हिम्लर ब्रेकफास्ट कर रहे थे उनकी बातें सुन कर हिटलर से रहा नहीं गया सीधे प्लेट स्टॉलिन के मुँह पर दे मारी 

 "  तो क्या तुम्हारे मार्क्स वाद को यहाँ पनपने दूँ या इस चर्चिल के ब्रिटिश साम्राज्य वाद को जिसके रानी के साम्राज्य में कभी सूर्यास्त नहीं होता था । आज मुँह छिपाते फिर रही है । 

तुम दोनों ने सर्वहारा और साम्राज्य वाद के नाम पर दुनिया में तबाही मचवाई और तुम तो कुछ बोलना नहीं रूजवेल्ट के बच्चे , तुम्हारी अमरीकी विदेश नीति ने दुनिया को तबाही के कगार पर पहुँच दिया है । 

आज ग्रीस बैंकरप्ट हैं तो वह तुम तीनो की वजह से ।

तुमने मेरी जर्मनी को लूटा, मैंने उसको पांच सालों में उसे सबसे अमीर देश बना दिया था , सबके चेहरे खिले थे ,सबके पास नौकरी थी।

दुनिया में लोग बेरोजगार है भूखे मर रहे हैं , आत्महत्या का दर बढ़ गया है । 

यह तो मैं हूँ जिसकी वजह से तुम लोगों को यहाँ दो वक़्त की रोटी नसीब हो रही है ।"

स्वर्ग में ब्रेकफास्ट रूम में भीड़ इकट्ठी हो चुकी थी लोग हेल हिटलर चिल्ला रहे थे ।

 तब तक वहां से स्टालिन , चर्चिल  ,रूजवेल्ट खिसकने में ही भलाई समझी  । 

स्वर्ग भी दो धड़ों में बंट चुका था वहाँ पर भी प्रथम विश्व युद्ध की आशंका के बादल साफ़ नजर आ रहे थे ।

" ज़िंदा ना सही मरने के बाद लोगों की नौकरी पक्की होना तय है ।"

( पंकज जोशी ) सर्वाधिकार सुरक्षित ।

लखनऊ । उ.प्र

06/07/2015

Sunday, 5 July 2015

एक था टाईगर
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एक दिन वह अपने जर्मन शेफर्ड को सुबह घुमाने ले गई तो गलती से एक व्यक्ति के घर पर बंधा पामेरियन भी था , पामेरियन भौंका तो टाइगर ने जंजीर को तेजी से छुड़ाते हुए पास में बंधे एक पामेरियन को दबोच लिया ।

" टाइगर इधर आओ छोड़ो उसको " बिटिया चिल्लाई 

वहां खड़े और लोग भी पामेरियन को बचाने में जुट गये। और उस लड़की को  भला बुरा कहने लगे " जब आप से कुत्ता नहीं सम्भलता तो इसे पालते क्यों हो ?

तभी किसी ने टाइगर के सर पर तेजी से लोहे की रॉड से वार किया ।

" बेचारी लड़की भागती हुई बदहवास सी भागती हुई घर आई !!" " मम्मी उन लोंगो ने टाइगर को लोहे से मार डाला "। 

जब तक उसको हस्पताल ले जाते तब तक उसने उसकी गोदी में अपनी आखिरी साँस ली और दुनिया से रुखसत कर गया ।

उसे आज आदमी और जानवर का   फर्क सामने ही नजर आ रहा था  ।

( पंकज जोशी ) सर्वाधिकार सुरक्षित ।

लखनऊ । उ.प्र

05/07/2015

राख
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उसकी महत्वाकांक्षा ने उसे उसकी और दिव्या की  नजरों में मुजरिम बना दिया था । 

कम्पनी में गबन के आरोप में आज पांच साल की कैद काट कर वह जेल से छूटा तो सीधे दिव्या के घर पहुँचा । दिव्या काम पर गई थी तो उसने उसके मोबाइल पर उसी जगह मिलने का समय दिया जहाँ वह अक्सर मिला करते थे । 

ऊपर से सफ़ेद चमकीली पन्नी और डिब्बी के अंदर कैद बीस किंग साइज फिल्टर वाली सिग्रेट्स के पीछे के का पीला लम्बा सा स्पंजी फिल्टर जेब से निकाल कर जैसे उसने उसमे से एक जलाई ही थी कि उसे एक आवाज सुनाई पड़ी ।

' मुझे भूल जाओ तुम अब मेरी जिंदगी में तुम्हारे लिये कोई जगह नहीं है अब ' पर यह सब तो मैंने तुम्हारी ख़ुशी के लिये किया था ? 

मेरी ख़ुशी या अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिये , मेरी ख़ुशी तो तुम्हारी बाहों में थी ना कि तुम्हारी कैदखाने की ज़िन्दगी में , कितना कुछ नहीं सुना तुम्हारे लिए मैंने विनय !! घर वालों से लेकर मोहल्ले वालो तक । 

मेरी अब शादी हो गई है और बीतीं बातों को यही दफन करो आज के बाद मुझसे मिलने की कोशिश भी ना करना।

" उसके कानों पर पड़े दिव्या के हर शब्द उसके सीने को बींध रहे थे ।"

सिगरेट अपनी पहली व दूसरी उँगलियों के मध्य दबी तेज रफ़्तार से जली जा रही थी । राख अभी भी सिगरेट के साथ चिपकी हुई थी ।

अचानक उसकी ऊँगली जली और उसने हाथ को झटका सिगरेट से बची राख भी उसकी ज़िन्दगी की तरह जमीन पर बिखर हुई  थी ।

" दिव्या वहां से कब गई उसे पता ही नहीं चला ।"

फिल्टर का आखरी कश उसने जोर से खींचा , जमीन पर बट फेंका और जूतों तलें रौंद कर चल दिया अपनी पुरानी दुनिया में जो उसे अपनाने को तैय्यार खड़ी उसका हाथ बाये इन्तेजार कर रही थी ।


( पंकज जोशी ) सर्वाधिकार सुरक्षित ।
लखनऊ । उ.प्र
05/07/2015

गुमनाम लाश
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"अगर तुमने मेरी पत्नी व बच्चों का पता नहीं बताया तो मैं मीडिया में जा कर तुम सबका भंडा फोड़ कर दूंगा । " रणजीत ने चिल्लाते हुए मीटिंग रूम में अपने चीफ को चेतावनी दी ।

' तुम ऐसा कुछ भी नहीं करोगे !! ' यह तो बस एतिहात के तहत उठाया गया कदम है , तुम्हारा उस लड़की से नजदीकी हमारे सिस्टम के खिलाफ है , इसे हम मंजूरी नहीं दे सकते हैं । 

और उस कसम का क्या जो तुमने देश के प्रति वफादारी की ली है ? 
कसम देश भक्ति की ली थी ब्लैकमेल होने की नहीं उसने जवाब दिया और तेजी से कमरे के बाहर चला आया। 

शहर के बाहर हाई वे पर एक कुचली हुई लाश पड़ी थी जिसका दाह संस्कार प्रशासन ने एक गुमनाम व्यक्ति के रूप में कर दिया।

( पंकज जोशी ) सर्वाधिकार सुरक्षित ।

लखनऊ । उ.प्र

05/07/2015

Saturday, 4 July 2015

गुमनाम लखौड़ी
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अवध के नवाब ने बड़े चाव से अंग्रेजों के लिये रेजिडेसी बनाने के लिये पहला लखौड़ी का पत्थर रखा तो उसको शायद यह भान ही ना होगा कि यह इमारत आने वाली सदी में अपने खानदान के आखिरी वारिस के लिये कांटो का ताज बनवा रहा है ।

पूरा अवध प्रांत अंग्रेजों ने वापस हासिल कर लिया । बदले में उनको रेजीडेन्सी में क्रांतिकारियों द्वारा  खेले खूनी खेल की गवाह वह खण्डर इमारत भी मिली।

असफल क्रान्ति ने नवाब को अंग्रेजों ने कलकत्ता फिर इंग्लैंड निर्वासित कर दिया ।

आज वही कभी सुंदर  रही इमारत , आज गुमनामी की धूल में दबी उस लखौड़ी की चीखें ,  प्रातः बुजर्गो व बच्चों के  चहल कदमी का स्थल व दिन में चोंच से चोंच लड़ाते  प्रेमियों के एकांत क्षणों के बीच दब कर रह गई।

( पंकज जोशी ) सर्वाधिकार सुरक्षित ।

लखनऊ । उ.प्र

05/04/2015