Friday, 28 August 2015

 " दंड "
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" क्यों चौधरी आज तुझे सांप क्यूँ सूँघा हुआ है, जब तेरे घर से बारात उलटे वापस चली गई ? यही पगड़ी तब क्यों ना उतरी ?  जब तू बरसों पहले श्यामा के घर से बारात वापस ले आया था ! तुझे उसी का श्राप लगा है ।"

अस्पताल के बिस्तर में फालिज की मार खाये चौधरी की आत्मा उसको रह रह कर कचोट रही थी ।

( पंकज जोशी ) सर्वाधिकार सुरक्षित ।
लखनऊ । उ. प्र
29/08/2015

Tuesday, 25 August 2015

स्पर्श 
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" सुनो तुमसे कुछ कहना चाह रही थी । "
 " हाँ पूछो ! " रमन ने किताब के पन्ने उलटते हुए कहा ।
" दरअसल मैं चाहती हूँ कि उमेश  ने शादी हमारी मर्जी से नहीं की पर उस बात को गुजरे कई साल गुजर गए हैं , आज हमारे बेटे को हमारी जरूरत है ! और क्या तुम्हे अपने पोते से आखिरी बार देखना नहीं चाहोगे ? " 
" यह क्या कह रही हो तुम उमा ? " " सच कह रही हूँ , उसको ब्रेन ट्यूमर है , हॉस्पिटल में उसका ऑपरेशन है आज ?"

एक अरसे बाद बाप बेटे का मिलन हो रहा है  आंसूओं से भीगे गाल पिता को आत्म ग्लानि के बोध से मुक्त करा रहे हैं ।

ऑपरेशन थियेटर से बाहर निकलते ही पोते के सिर पर हाथ फेरते हुए बुदबुदाये, "तुझे कुछ नहीं होगा बेटे । "

(पंकज जोशी )
लखनऊ । उ०प्र०
25/08/2015

Monday, 17 August 2015

जेनरेशन गैप 
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" हाय रब्बा आज कल की कुड़ियों को देखो तो सही ! , कैसे - कैसे कपडे पहनती हैं, दिन भर फोन में चिपकी रहती हैं ,  इनके मोबाईल मैसेजेस पढ़ो तो शर्म से आँखे धरती पर गड़ जाये । अभी पड़ोस के शर्माइन की लड़की ने अपनी कमर में दिल वाला टैटू गुदवा रखा है , बड़ी मटकते हुए घूम रही है है पूरे मोह्ल्ले में , अब यह कोई बात हुई !  दिल भी भला कमर में होता है क्या ? आजकल  बच्चो को कोई लाज शर्म रह ही नहीं गई है  । "  

सामने टीवी सीरयल देखती हुई और हाथों से मटर के दाने छीलती हुई राधा अपनी कालेज की सहेली शीला से गप्पें मार रही थी । 

" तो तू क्या कम थी अपने जमाने में , क्या- क्या गुल नहीं खिला रखें हैं तूने । देख मेरा मुँह ना खुलवा ..."

अरे हमारे जमाने और थे और यह ज़माना कुछ और है  , तू तो बिलकुल भोली है । "

कमरे में तान्या प्रवेश करती हुई बोली ! " मम्मा जमाने सब एक होते हैं , बस सोच सही होनी चाहिये "

हाय रब्बा अब यह बच्चे हमें सिखाएंगे .................?

( पंकज जोशी ) सर्वाधिकार सुरक्षित ।
लखनऊ । उ.प्र 
18/08/2015

Friday, 14 August 2015

प्रायश्चित
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अब्दुल्ला ने आतंकवाद का रास्ता छोड़ एक सामान्य नागरिक का जीवन बिताने का फैसला किया । 
आज जुमा है ,  वह नमाज करके जैसे ही उठा तो सामने उसने राशिद को खड़ा पाया । 

" क्या हुआ राशिद ऐसा बदहवास सा क्यों है ? , क्या बात ......... ? " इससे पहले कि वह कुछ बोलता , उसने उसके हाथ में एक पर्ची थमा दी , तेजी से पलटा और वहां से चला गया ।

पंद्रह अगस्त के दिन स्कूल में आतंक वादी हमला ! रह रह कर पर्ची में लिखे शब्द उसे याद आ रहे थे ।

स्कूल में आयोजन की जबरदस्त तैयारी चल रही थी । झंडा रोहण शुरू होने ही वाला था तभी उसने दूर से मानव बम फैजल को चिन्हित कर लिया । 

अब्दुल्ला की पैनी नजर दूर से  उसके ऊपर टिकी थीं ।

जब तक वह मंच तक पहुँचता ,  अब्दुल्ला उस पर भूखे शेर की तरह झपट पड़ा । 

मंच से दूर मैदान पर एक जोरदार धमाका हुआ ।

अब्दुल्ला की शहादत बेकार नहीं गई । सैकड़ो खिलते मासूम चेहरे इस बात के गवाह थे

( पंकज जोशी ) सर्वाधिकार सुरक्षित ।
लखनऊ । उ.प्र 
14/08/2015

Thursday, 13 August 2015

सोशलाइट
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शहर में चारों ओर जाम लगा है टीवी चैनल वाले सीधा प्रसारण कर रहे हैं , व्यस्तम चौराहे पर गाँधी प्रतिमा के नीचे " बाल मजदूरी व शोषण के खिलाफ  धरने पर बैठी महिला उस समय किसी को मुँह दिखाने के काबिल ना रही जब उसी के खिलाफ  बाल मजदूरी व शोषण क़ानून के उल्लन्घन करने पर पुलिस ने उसको गिरफ्तार कर लिया ।
टीवी पर उसके लाइव टेलीकास्ट ने रातों रात उसे मशहूर कर दिया ।

( पंकज जोशी ) सर्वाधिकार सुरक्षित ।
लखनऊ । उ.प्र 
13/08/2015

Monday, 3 August 2015

बेईमान रिश्ते
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मन अपनी अबाध गति से चला जा रहा था , तेज रफ़्तार से उड़ा जा रहा था एक पतंग की तरह सहसा ही पीछे से आवाज आई मेरे छोटे भाई की थी , और मैं तन्द्रा से बाहर निकला ।

" दद्दा हम पतंग उड़ाते है चरखी एक हाथ में लिए ! मैंने कहा हाँ मान लो अगर पतंग की डोर टूट गई  तो क्या करोगे ?  मैंने कहा दुबारा मांझे पर गाँठ लगा दूंगा ? फिर भी ...तो मैंने कहा जितनी बार टूटेगी उतनी बार बांधूंगा । उसके बाद ? उसने पूछा ! मैं नई डोर ले आऊंगा !

तो क्या आप को नहीं लगता कि ज़िन्दगी में हम जितनी बार लड़ते हैं तो मन में गाँठ बनती जाती है ? ऊपर से भले ही हम एक दिखें क्या रिश्तों की डोर में मन की गांठे जुड़ तो जाती है , पर वे भी क्या पतंग की डोर की तरह एक समान रहती हैं ? क्या आप उसको फैंक कर नया रिश्ता नये सिरे से जोड़ सकते हो ?

निरुत्तर मैं छत की दीवार को तांक रहा था ।

( पंकज जोशी ) सर्वाधिकार सुरक्षित ।
लखनऊ । उ.प्र
04/08/2015