Thursday, 29 October 2015

शह और मात

" ताऊ ! इस शतरंज के खेल में इक बात मुझे आज तक समझ में ना आई ? " " क्या हुआ भतीजे तुझे मेरी चालों से डर लगने लगा क्या ? " ताऊ ने खटिया पर बैठे बैठे अपनी घनी मूछों को ताव दिया ।

" नही ऐसी कोई बात नहीं है बस यूँही एक विचार आया कि घोडा ढाई घर चले हैं,ऊंट तिरछा , हाथी सीधा , वजीर चारों ओर तो यह बादशाह अपनी जगह एक खाने से दूसरे खाने क्यों नाचे है?"
" अरे पगला गया है क्या खेल के भी कुछ नियम होते हैं । फिर राजा तो राजा होवे है उसका काम तो सबकी पीठ पीछे युद्ध का संचालन करना है । नेतृत्व बोलें हैं बड़े बुजुर्ग इसको"
" पर ताऊ हमने तो सुना है कि बादशाह लोग तो अपने को युध्द में आगे कर युद्ध में बढ़चढ़ कर हिस्सा लेते थे?"
"वह बीते दिनों की बातें थी बेटा आजकल तो सिर्फ दूर से ही फैसले उल्टा पुल्टा करता है।"
"तो क्या ताऊ तू भी कहीं अपने को बादशाह तो ना समझ बैठा है।"
" कैसी बात कर रहा है तू छोरा ? "
"सच्ची बात कर रहा हूँ क्या तू अपना पाप मेरे गले में ना बाँधना चाहे है। शहर में रहता हूँ तो क्या ? गाँव की हवा मेरे को भी छूती है। ले बचा अपना राजा यह शह और यह मात।"
पसीने से तरबतर ताऊ अंगोछे से अपना मुँह छुपाये बैठा था ।



( पंकज जोशी ) सर्वाधिकार सुरक्षित ।

लखनऊ । उ०प्र०
३०/१०/२०१५

Wednesday, 28 October 2015

वंश - 2

"अरे बधाई हो आपको नानी जी ! परनानी जो बन गईं आप , आज मैं बहुत खुश हूँ । दीपावली में साक्षात लक्ष्मी जी हमारे घर पधारीं हैं । यह लीजिये मुँह मीठा कीजिये । "

निमेष ने जैसे ही मिठाई का डिब्बा खोल मिठाई उनको खिलानी चाही उन्होंने बेरुखी से मुँह फेरते हुए कहा । " आपको पता नहीं दामाद जी ज्यादा मीठा खाने से सुगर बड़ जाती है । और वैसे भी लड़की ही  पैदा हुई है कोई लड़का तो नहीं । अब लक्ष्मी  आयेगी या जायेगी यह तो वक़्त ही बतायेगा । "

( पंकज जोशी )सर्वाधिकार सुरक्षित ।
लखनऊ । उ०प्र०
२९/१०/२०१५

वंश

" अरे भई कोई घर में घी के दिये जलायेगा भी या नहीं  ,  लड्डू मिठाई से मुँह तो मीठा कराओ दामाद जी का  घर में साक्षात लक्ष्मी जी पधारी है । "
" अरे अम्मा जी ! आपको भी बहुत-बहुत बधाई  रातों रात इतना बदलाव कैसे ?  " 
" अरे निमेष जी आप भी ना बातों को पकड़ बैठते है । जमाना बदल गया है अब वंश लड़को से नहीं लड़कियों से चलेगा मैं कहे देती हूँ हाँ नहीं तो । "

( पंकज जोशी ) सर्वाधिकार सुरक्षित ।
लखनऊ । उ०प्र०
२८/१०/२०१५

Monday, 19 October 2015

सच्चा व्रत

मंदिर में स्वामी जी का प्रवचन चल रहा था । 
" मनुष्य का अपनी वृतियों पर नियंत्रण ही सच्चा व्रत है । "
इन चंद शब्दों ने उसके अंतर्मन को बींध कर रख दिया । अब वह पहले जैसा नही रहा था । 

मार्ग के पथरीले पत्थर उसका इन्तेजार कर है ।

( पंकज जोशी )सर्वाधिकार सुरक्षित ।
लखनऊ । उ०प्र०
१९/१०/२०१५

माँ

" अरे  पकड़ो पकड़ो , पकड़ो  उस चोर को  ! बस रोको भई । अरे मेरी पत्नी हस्पताल में भर्ती है उसकी दवाई लानी है । अरे कोई तो पकड़ो उसे।"

 तभी एक व्यक्ति छोटे से बच्चे को घसीटता हुआ लाता है । 

 " भाईसाहब  यह लो आपका मुजरिम " " क्यों बे ! इतनी छोटी सी उम्र में चोरी चकारी क्या यही सिखाया है तुझे तेरे  माँ बाप ने ? । व्यक्ति ने उसको बालों से खींचतें हुए पूछा 

 " नहीं साब मेरी माँ  " 

" क्या हुआ तेरी माँ को ?
 व्यक्ति ने  बच्चे से भौयें सिकोड़ते  पूछा ।

 " माँ , हस्पताल के बाहर पड़ी है । "

( पंकज जोशी )सर्वाधिकार सुरक्षित ।
लखनऊ । उ०प्र०
१९/१०/२०१५

Saturday, 17 October 2015

अस्तित्व

" क्या बात है सुकन्या तुम्हारी आँखों में आँसू क्या तुम मेरे साथ गाँव में खुश नहीं हो ? " 
" नहीं ऐसी कोई बात नहीं है बस यह कमबख्त कब निकल आये पता ही नहीं चला । बीते दिनों  की याद चली आई । अब तो बरसों बीत गए इस बात को ।  मैं तुम्हारा अहसान कैसे भूल सकती हूँ रवि ! , अगर उस  रात तुम ना होते तो मैं समाज को क्या मुँह दिखाती ? "

" इसमें अहसान कैसा पगली तुम तो मुझे सैदेव ही पसन्द थी। लेकिन जो भूल मुझसे हुई रंगमंच की अदाकारा को घर में बाँधने की उसका प्रायश्चित मैं करके रहूँगा । हम कल ही शहर चलेंगे । तुम्हारे नाम पर पड़ी धूल की परत हटाने । "

( पंकज जोशी ) सर्वाधिकार सुरक्षित ।
लखनऊ । उ०प्र०
१७/१०/२०१५

डर

" अरे वाह ! देखो तो सही श्रीमती जी आज की लड़कियों के चेहरों  को , आत्मविश्वाश से भरपूर देश की रक्षा के लिये कुछ भी कर गुजरने को तैय्यार हैं । " समाचार पत्र में छपे चित्र को दिखाते हुए शर्मा जी बोले ।
तभी पीछे से प्रीति की आवाज सुनाई पड़ी " माँ ! शाम को कालेज से आने में जरा देर हो जायेगी फेयरवेल पार्टी है ।
 " कोई जरूरत नहीं फेयरवेल पार्टी में जाने की क्लास खत्म होने के बाद सीधा घर आना समझी !  " पर बाबू जी फेयर वेल पार्टी तो हम लोंगो के लिये है और अभी आप ही तो कह रहे थे आज कल की लड़कियाँ आत्मविश्वाश से भरी हुई हैं " 
" पेपर में जो कुछ भी छपता है वह सब सच नहीं होता समझी " आँखें तरेरते हुए शर्मा जी बोले ।

(पंकज जोशी) सर्वाधिकार सुरक्षित ।
लखनऊ । उ०प्र०
१७/१०/२०१५

Wednesday, 14 October 2015

स्वत्व


" क्यूँ री तेरे खान पान रहन सहन में क्या कमी रखी जो तू हमें ही आँखे दिखा रही है । " 

" तूने कोई कसर नहीं छोड़ी मौसी पर मैं आँखें बंद कर उस लड़के को हाँ भी नहीं कह सकती । ऐसे व्यक्ति से जिसका अपना कोई अस्तित्व ना हो  मैं उसके साथ ज़िन्दगी कैसे गुज़ार दूँ ? तुम्ही बताओ ?

" ऐसा ना हो कि तुझे कल पछताना पड़े ।  " " पछताना कैसा मौसी क्या समाज के लिये स्वयं की बलि चढ़ा दूँ ? बगैर स्वत्व का भान किये ? "

( पंकज जोशी ) सर्वाधिकार सुरक्षित ।
लखनऊ । उ०प्र०
१४/ 10 / २०१५

Tuesday, 13 October 2015

अहं

" सुनो जी आज से अपने भैय्या से कह देना कि मुझसे रौब से खाना पीना मत माँगा करें ।  मेरी शादी तुम्हारे संग हुई है तुम्हारे घर वालों के साथ नहीं ! " 

 " पर उमा मैं यह कह सकता हूँ भाभी को गये अभी महीना भर नहीं हुआ है ऊपर से बिट्टू भी तो छोटा ही है क्यों  तुम बच्चे को स्वयं अपना लेती । "

" मैंने दुनिया जहाँ का ठेका नहीं ले रखा सोमेश कल मैं अपने माँ के घर चली जाऊँगी जब तुम्हारे भैय्या का इंतजाम हो जाये तो मुझे बुला लेना " 

पर ऐसी निष्ठुर तुम कैसी हो सकती हो तुम भी तो एक स्त्री हो । 

तभी उन्हें पीछे से बड़े भैय्या की आवाज सुनाई पड़ी - बहू ! तुम्हें कहीं जाने की जरूरत नहीं मैं कोई ना कोई इंतेजाम कर लूँगा भाग्य की मार के आगे तुम्हारे वचन फिर भी अच्छे हैं ।

( पंकज जोशी )सर्वाधिकार सुरक्षित ।
लखनऊ । उ०प्र०
13/10/2015

Thursday, 8 October 2015

किट्टी पार्टी

"मिसेज दीक्षित मैंने सुना है कि आप चुनाव लड़ रही हैं ? "  " सुना क्या मतलब जमुना पार का टिकट मुझे  मिला है मिसेज श्रीवास्तव । " अपने गले का हार ठीक करते हुए बोलीं ।


" पर आप कब से समाज सेविका बन गईं अरुणा जी ! " वोदका का शॉट मारते हुए बोली । 

" अरी मिसेज श्रीवास्तव आपका बचपना कब जायेगा ! क्या समाज सेवा के लिये चुनाव लड़ा जाता है ? गुस्से से मेज पर पत्ते पटकते हुए बोली "ट्रेल है!"


(पंकज जोशी) सर्वाधिकार सुरक्षित ।



लखनऊ । उ०प्र०



०८/१०/२०१५