Sunday, 29 November 2015

नशा उन्मूलन

मुरारी बाबू के शव को प्रणाम कर उनके बचपन के मित्र सोमेश उनकी धर्मपत्नी को सांत्वना देने पहुंचे " अरे भाभी जी यह सब अचानक कैसे हो गया? क्या कहें भाईसाहब कल रात ये खाना खाने के बाद सोने जा रहे थे कि अचानक से इनके सीने में दर्द उठा ----और बस । यह सचमुच आप लोंगों के साथ बुरा हुआ परमतम आप लोगों को इस असमय दुःख को सहने की ––– " सोमेश जब तक अपने शब्दों को विराम देते तब तक पास में बैठा मुरारी बाबू का सुपुत्र रवि यह सब सुन कर अपनी भावनाओं को काबू में ना रख पाया और जोर से फूट फूट कर रोने लगा " यह सब मेरे कारण हुआ है माँ ! ना मैं कल रात नशे की हालत में घर आता और ना ही बाबू जी इस तरह बिना इलाज के तड़पते हुए प्राण छोड़ते " सुमित्रा उसके पास आकर उसके सिर पर हाथ फेरते हुए बोली " यह सब तो विधि का विधान है , इसमें तेरा क्या दोष । हाँ , अगर तुम अपने अंदर की पश्चाताप की आग में जल रहे हो तो बेटा अपने पिता के सामने प्रण लेना होगा कि आज कि आज के बाद तुम ना केवल इस कुरीति का त्याग करोगे बल्कि औरों को भी नशा त्यागने के लिए भी को भी प्रेरित करोगे । यही तुम्हारी उनके प्रति सच्ची श्रद्धाजंलि होगी ।

पंकज जोशी (सर्वाधिकार सुरक्षित )
लखनऊ । उ०प्र०
30/11/2015

Wednesday, 4 November 2015

अपराधी कौन

" श्याम तेरी आज रिहाई है । जैसा तू यहाँ अच्छा बन के रहा तू ऐसा ही बाहर भी  बन के रहना और देख अब कोई लफड़ा नहीं मांगता। " 

बाल सुधार गृह संचालक ने उसकी ओर मुखातिब हो कर कहा ।

आज तीन बरस बाद उसकी रिहाई थी । अपनी बहन को छेड़ने वाले लड़के को हॉकी से मार मार कर अधमरा कर मार डाला था । 

इतने दिनों तक वह ज़िंदा है कि मर गया परिवार जनों में से किसी ने भी उसकी सुध नहीं ली थी । आज उसे कोई लेने तक नहीं आया था । सीधा माँ-बाप से मिलने घर की ओर चल पड़ा ।

मोहल्ले में कदम रखते ही रहमान चाचा चिल्ला पड़े " अरे अपने अपने बच्चो को सम्भालना जरा हत्यारा जेल से छूट कर आ गया है कहीं कोई जरा सी बात हुई नहीं कि किसी का फिर से कत्ल पता चला हो जाय । " 

" चाचा यह क्या बोल रहे हो आप ? मैंने कोई जानबूझ कर मारा था उसे । अपनी बहन की रक्षा की थी उससे " अपना पक्ष रखते हुए बोला ।

" चुप ****** बदजात अपनी औकात में रह । हरामी कहीं का । चल फुट यहाँ से नहीं तो पुलिस के हत्थे चढ़वा दूंगा । "

आँखों से उसकी आंसू की एक धारा बह चली थी । घर पहुँच कर उसने कुण्डी खटका ही थी कि सामने उसने अपनी बहन को खड़ा पाया । " तुम यहां ? क्यों क्या हुआ ? " जब तक वह कुछ पूछता तब तक सीमा एक साँस में ही सब कुछ बोल गई । " तुम्हारी यहाँ कोई  जरूरत नहीं मेरी अगले हफ्ते शादी है और तुम्हारे जैसे हत्यारे की बहन होने से अच्छा है मैं बिना भाई के ही रहूँ। और मेरे ससुराल वाले भी तुम्हारे बारे में कुछ नहीं जानते है । मैं अपने माँ बाप की इकलौती औलाद हूँ उन्हें बस इतना ही पता है । पर यह सब तो सीमा मैंने तुम्हारे लिए किया था । " 

उसने मेरा सिर्फ हाथ पकड़ा था कोई मेरा बलात्कार नहीं - जो तुमने उसे बेरहमी से मार डाला । अब आज के बाद मुझे अपनी शक्ल ना दिखाना । "

आज वह एक बार फिर  कोर्ट में जज के सामने खड़ा था लेकिन इस बार उसका सिर नीचा नही गर्व के साथ ऊँचा था । 

पंकज जोशी 
लखनऊ । उ०प्र०
०४/११/२०१५

Tuesday, 3 November 2015

व्यथा -1

" ओ हरिया जरा सुन तो ?" क्या बात है काका जय राम जी की ! "

" जय राम जी की बचवा ! शहर से कब आये तुम " बस कल ही आया चाचा तुम सुनाओ घर में कुशल मंगल है चाची जी कैसी है ? रामू कैसा है ? "

 "अब क्या बताये बच्चा घर की बात घर तक ही रहे तो अच्छी रहती है पर तुम भी तो पराये कहाँ ठहरे । रामू पिछले बरस वह सुखिया की जोरू के संग शहर भाग गया है । और तेरी चाची को उसी के गम में फालिज मार बैठा । "

 " पर वह तो उम्र में उससे बड़ी थी ना चाचा ? "  " हाँ बड़ी तो थी बेटा " । ओह फिर तो यह बहुत बुरा हुआ चाचा तुम्हारे परिवार के साथ । " 

" अरे कीड़े पड़े नासपीटी उस कलमुहीं के जो मेरे बुढापे का सहारा छीन मुझसे छीन लिया ।"

 " देखो चाचा यहां तुम गलत बात कर रहे हो अब इसमे उस बेचारी औरत का क्या दोष । अब तुम्हारा सुखिया कोई कम है , यह तो पूरा गांव जानता है उसके लक्षण के बारे में। दिन भर नशे में चूर और रात भर उसके घर में आने जाने वाले  लोंगो का ताँता लगता था । आखिर वह भी एक इंसान थी कोई पत्थर की मूरत नहीं उसको भी इस दलदल से छुटकारा चाहिए था । तो जरिया तेरा लड़का बना । अच्छा अब मैं चलता हूँ राम राम । "

( पंकज जोशी ) सर्वाधिकार सुरक्षित ।
लखनऊ । उ०प्र०
०२/११/२०१५

Monday, 2 November 2015

व्यथा

" ओ हरिया जरा सुन तो ?" क्या बात है काका जय राम जी की !" जय राम जी की बचवा ! शहर से कब आये तुम " बस कल ही आया चाचा तुम सुनाओ घर में कुशल मंगल है चाची जी कैसी है ?रामू कैसा है ? क्या बताये बच्चा घर की बात घर तक ही रहे तो अच्छी रहती है पर तुम भी तो पराये कहाँ ठहरे । रामू पिछले बरस वह सुखिया की जोरू के संग शहर भाग गया है । और तुम्हारी चाची को उसी के गम में फालिज मार बैठा । " पर वह तो उम्र में उससे बड़ी है चाचा । " अब क्या बात क्या क्या अरमान संजोये थे बेटे की शादी को लेकर ऊपर से तेरी बहन के ससुराल वालों को उचित दहेज़ ना दे सका तो उसे पेट से है जानकार उसे यहां पटक गये । नासपीटी अपना घर छोड़ कर मेरी छाती में मूंग दल रही है। अब मैं अकेला इस  बुढ़ापे में घर बार चूल्हा चौक्का करूँ या खेतों में अनाज बोऊं । साहूकार ने जो रुपया उधार दिया था खेती के लिये पर बिन मौसम बरसात उसे ले डूबी । उसकी नजर मेरे खेत में हैं  मेरा जीवन तो जैसे अर्थहीन हो गया है । इस पार नदी तो उस पर खाई । अरे तुमको भी कहाँ लपेट लिया अपने चक्कर में कभी मौका मिले तो शहर में अपने भाई को जरा समझाना कि घर लौट आये । अच्छा अब मैं चलता हूँ। राम राम।"

( पंकज जोशी ) सर्वाधिकार सुरक्षित ।
लखनऊ । उ०प्र०
०२/११/२०१५