Tuesday, 13 September 2016

प्रकृति

"अहा , कितना सुंदर दृश्य है चांदनी रात में कैसी मनोरम छटा छाई हुई है । ओह तुम आ गये ? वह बोली 
"कैसे ना आता आधी रात बीतने को आई है लगता है घर के सभी लोग सो गये हैं तुम क्यों नहीं सोई अभी तक कैसे सो सकती थी बिना तुम्हें कुछ खिलाये हुए तुमने भी अभी कुछ नहीं खाया होगा चलो साथ खाते हैं।उसने जोर देते हुए कहा।
प्रकृति ने जैसे ही उठने के लिये अपने सिर पर घूंघट काढ़ने के लिये मुख उठाया ,

 "अप्रतिम! हो तुम । हा आज इस चांदनी रात में तुम चाँद से भी अधिक सुंदर लग रही । इतने वर्ष हो गये हमारे विवाह के पर घर गृहस्थी , ज़िन्दगी की भाग दौड़ ने कभी अवसर ही नहीं मिला एक पल साथ में गुजारने का।"

कहते हुए पुरुष ने प्रकृति को अपने अंको में समेट लिया । चुम्बनों के बीच बहते अश्रुओ की धारा ने पुरुष के पाषाण हृदय में प्रेम के सुवासित फूल खिला दिये थे ।

( पंकज जोशी ) सर्वाधिकार सुरक्षित ।
लखनऊ । उ०प्र०

Wednesday, 25 May 2016

प्यासा कुआँ

कैलाश में भगवान शिव ध्यानस्थ अवस्था में लीन थे । तभी नारद जी वहाँ पहुंचे " नारायण नारायण , हे ! प्रभु पृथ्वी लोक में  जनता परेशान व दुःखी है सर्वत्र लोग त्राहिमाम त्राहिमाम पुकार रहे हैं कुछ तो अपने भक्तों के कष्टों का निराकरण करें ।"

नारद की आवाज सुन शिव अपनी समाधिस्थ अवस्था से बाहर निकले और बोले , हे ! नारद मैंने तो प्रकृति को मानव के रहने के अनुकूल ही बनाया था पर मनुष्य ने अपने बढ़ते लालच के कारण भू माता का ही दोहन करना शुरू कर दिया । देखो ना पृथ्वी में चहुँ ओर जंगलो में आग ही आग लगी है नदियाँ सूखने लगी है । जंगल समाप्त हो चुके है , कृषक भूमि समाप्त हो चुकी है उसकी जगह बड़े बड़े शॉपिंग माल ने ले ली है जनगण सभी दाने - पानी को मोहताज हो चुके है । देखो नारद भू लोक में कैसे कुयें के चारों ओर मारकाट मची हुई है । लोग बूँद बूँद पानी के लिये कैसे अपनो के खून के प्यासे हो अपनों के ही रक्त से सूखें  कुँए की प्यास बुझा रहे हैं । " 

"नारायण नारायण प्रभु आप ही सृजक और आप ही संहारक हैं । मैं पालन कर्ता विष्णु लोक को चला नारायण नारायण।"


(पंकज जोशी )सर्वाधिकार सुरक्षित 
मौलिक व अप्रकाशित ।
26/06/2016

प्यासा कुआँ 1

कैलाश में भगवान शिव ध्यानस्थ अवस्था में लीन थे । तभी नारद जी वहाँ पहुंचे " नारायण नारायण , हे ! प्रभु पृथ्वी लोक में  जनता परेशान व दुःखी है सर्वत्र लोग त्राहिमाम त्राहिमाम पुकार रहे हैं कुछ तो अपने भक्तों के कष्टों का निराकरण करें ।"

नारद की आवाज सुन शिव अपनी समाधिस्थ अवस्था से बाहर निकले और बोले ," हे ! नारद मैंने तो प्रकृति को मानव के रहने के अनुकूल ही बनाया था पर मनुष्य ने अपने बढ़ते लालच के कारण भू माता का ही दोहन करना शुरू कर दिया । देखो ना पृथ्वी में चहुँ ओर जंगलो में आग ही आग लगी है नदियाँ सूखने लगी है । जंगल समाप्त हो चुके है , कृषक भूमि समाप्त हो चुकी है उसकी जगह बड़े बड़े शॉपिंग माल ने ले ली है जनगण सभी दाने - पानी को मोहताज हो चुके है । देखो नारद भू लोक में कैसे कुयें के चारों ओर मारकाट मची हुई है । लोग बूँद बूँद पानी के लिये कैसे अपनो के खून के प्यासे हो अपनों के ही रक्त से सूखें  कुँए की प्यास बुझा रहे हैं । "

नारायण नारायण प्रभु नारद जी ने की  ही आवाज जैसे ही मेरे कानों में पड़ी ।

 तुरन्त मैं नींद से हड़बड़ा कर उठा और संकल्प लिया की आज से हर व्यक्ति को जंगल बचाओ पर्यावरण बचाओ के लिये प्रेरित करूँगा ।

(पंकज जोशी ) सर्वाधिकार सुरक्षित ।
मौलिक व अप्रकाशित ।
26/06/16

Monday, 2 May 2016

लाल सलाम -एडिटेड

"अरे रवि बहुत दिनों बाद दिखे हो ? कहीं बाहर गये थे क्या?"
कैम्पस में काफी समय बाद मिली बचपन की दोस्त आयशा ने उससे पूछा ।
"बस यूं ही घर चला गया था।"
"बड़ी अजीब बात है, कल ही मैंने घर फोन किया था तो पता चला कि तुम कई महीनो से घर गये ही नहीं।"
"अच्छा मेरी अम्मा, तुम अभी चलो मुझे क्लास अटेंड करनी है और भी काफी काम है।"
"वैसे यह क्या हुलिया बना रखा है तुमने ? लम्बे बाल, दाढ़ी, फ़टी जीन्स, यह चप्पल और कंधे पर झोला।" 
"वो.. बस यूँ हीं ......."
"कैम्पस में लोग ना जाने तुम्हारे बारे में बातें कर रहे हैं , तुम्हे पता भी है?"
"क्या कहते हैं मेरे बारे में?"
"यही कि तुम किसी संगठन से जुड़ें हो।"
"तो क्या मैंने कोई अपराध कर लिया ?"
"देखो मैं तुम्हें कुछ समझाने का प्रयत्न कर रही हूँ कि ...."
इससे पहले की वह कुछ कहती तभी उसने उसे रोक दिया 
"देखो तुम मेरी पैरेंट बनने की कोशिश ना करो। और तुम्हें यह अधिकार दिया किसने कि तुम मेरी इंकायवरी करती फिरो?"
"क्या यह भी बताना होगा कि मैं तुम्हारी कौन हूँ ? चलो बैठो कार में, पहले मैं तुम्हारा हुलिया बदलवा दूं फिर किसी अच्छे से रेस्त्रां में बैठ कर ढेर सारी बातें करेंगे।"
"तुम पूंजीवादियों की यही समस्या है कि हर समय अपने पैसे की धौंस जमाते रहते हो।"
"हैलो ! यह क्या बोल रहे हो हमारे बीच यह सब कहाँ से ? ..... " 
तभी पीछे से आती हुई भीड़ के नारों में उसकी आवाज दब गई और रवि ने तेजी से अपना हाथ आयशा से छुड़ाया और इंक़लाब ज़िंदाबाद-पूंजीवाद मुर्दाबाद  चिल्लाता हुए उसमे खो गया ।

( पंकज जोशी )सर्वाधिकार सुरक्षित ।
लखनऊ । उ०प्र०

लालच

कंपनी बोर्ड की मीटिंग चल रही थी, जनरल मैनेजर विभोर मीटिंग का एजेंडा पढ़ रहा था । तभी एम डी साहब के मोबाईल पर वीडियो फ़्लैश हुआ और वे विभोर से बोले

"अरे जी०एम्० साहब! कब तक यह एजेंडा सुनाकर इन लोंगो को बोर करेंगे। आइये हम सब थोडा मनोरंजन कर लें।"
"पर सर कंपनी के लिए एजेंडा इम्पोर्टेन्ट हैI" विभोर ने उन्हें टोकते हुए कहा ।

"लेकिन मिस्टर विभोर, जो मैं दिखाने जा रहा हूँ वह उससे भी अधिक महत्वपूर्ण हैं I जिसे देखने के बाद शायद आपकी जिंदगी ही बदल जाए। पर उससे पहले मैं आप लोंगो से पहले कुछ पूछना चाहता हूँ कि यह कंपनी आप सबके लिए क्या मायने रखती है ?"

अचानक कमरे में सन्नाटा पसर गया ।
"अरे आप सब खामोश क्यों हैं? अच्छा तो विभोर जी आप ही बताइयेI"

विभोर अपनी सीट से उठा और आत्मविश्वाश से बोला:
"सर कंपनी हमारी माँ है । "
"क्यों और कैसे?" बॉस ने पूछा ।
"सर यह हमें रोजी-रोटी देती है।" कहते हुए वह अपनी सीट में वापस जा बैठा ।

"वेरी गुड! मुझे आपसे ऐसी उम्मीद थी।" एम डी साहब बोले ।

और अपने फोन को प्रोजेक्टर से अटैच कर वीडियो दिखाने को कहा ।

"चलिये आज हम सब अपनी रोज़ी रोटी से मिलते हैं ।"

प्रोजेक्टर ऑन हुआ, विडियो शुरू हुआ। उसमे विभोर एक सुन्दर महिला से बात रहा था: 
“ये लो मैडम उस टेंडर की कॉपी जो हमारी कम्पनी ने भरा है I”

“वाह विभोर जी, आपने अपना वादा निभायाI ये लीजिए आपका इनामI” नोटों से भरा लिफाफा पकड़ाते हुए उसने कहा ।


“ओह थैंक्यू डिअर...” कह कर उस लड़की की कमर में हाथ डालने लगा, जिसे लड़की ने बीच में ही रोक दिया ।


“इतनी जल्दबाजी ठीक नहीं विभोर जी, हम कहीं भागे थोड़े ही न जा रहे हैंI टेंडर की कॉपी के लिए पैसे आपको दे दिये गये है। अब इससे आगे बढ़ना चाहते हैं तो कंपनी के नए प्लांट का ब्लूप्रिंट दिखा दीजिये।“


वीडियो समाप्त हो गया। विभोर सिर से पाँव तक पसीने से भीगा हुआ था, उसके हाथ पाँव काँप रहे थे।

"सर! मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गईI" कहते हुए जैसे ही वह उनके क़दमों पर गिरना चाहा .....

तभी बॉस की कड़कती हुई आवाज़ ने हाल में पसरे सन्नाटे को तोड़ दिया ।


"हरामखोर! जिस कम्पनी को माँ बताता है, उसी के साथ बलात्कार ? जिस थाली में खाता है उसी में छेद?" कहते हुए उसने इंटरकॉम का बटन प्रेस किया ?

"सिक्योरिटी, मैडम को अन्दर भेजो । "


अगले पल एमडी ने वीडियो वाली लड़की का परिचय अपने मैनेजमेंट से करवाया: इनसे मिलो ये हैं हमारी नई जनरल मेनेजर मिस रोजिटा ।”

( पंकज जोशी ) सर्वाधिकार सुरक्षित ।

लखनऊ । उ०प्र०
29/04/2016

Wednesday, 16 March 2016

दर्द

हस्पताल में अपने बेटे के पास बैठा ही था तभी अचानक चौधरी का फोन खनखनाया । मंत्री का फोन था सो उसे उठाना पड़ा । " जी मंत्री जी , क्यों बे ! चौधरी आज का अखबार देखा क्या ? नहीं साहब क्यों हुआ ? चौधरी बोला उधर से मंत्री ने उत्तर दिया क्या सारा माल अकेले हजम कर जायेगा कैसा घटिया मसाला लगाया कि पुल उद्घाटन से पहले ही गिर गया दो मजदूर परिवार पिस गये । साहब कट तो आपको भी गया था  " कहते हुये उसने अपना सिर
पकड़ लिया ।

" पापा मुझे क्या हुआ , मुझे कमजोरी हो रही है ? " बेटा तुझे कुछ नहीं हुआ बस एक दो दिन की बात है फिर डिस्चार्ज कराके घर चलेंगे। रोहित के पिता ने कहा ।
तभी उसकी तबियत अचानक बिगड़ गई " पापा मुझे छोड़ कर मत जाना मेरी आँखों  के सामने अँधेरा छा रहा है । तू रुक अभी मैं डॉक्टर को बुला कर लाता हूँ । "

" डॉक्टर साहब मेरे बच्चे को बचा लीजिये जितना रुपया चाहिए मैं आपकी झोली भर दूंगा यह लीजिये यह सोने का हार  दो तोले का है । "

" कैसी बातें कर रहे हैं चौधरी साहब उसको लुकिमिया है । आखरी स्टेज है बचना मुश्किल है ।

" पैसे से आप किसी की जिंदगी नहीं खरीद सकते डॉक्टर ने उसे समझाते हुए कहा ।"

चेहरे पर निराशा , हताशा के भाव लिये वह लड़खड़ाते क़दमों के साथ रोहित के बेड के पास पहुंचा । बुदबुदाते हुए हे ! " भगवान मेरे पापों का फल मेरे बच्चे को मत दो । "

पापा पापा कहते हुये रोहित ने उसकी गोद में आखरी सांस ली ।

श्मशान घाट पर चौधरी को अपनी दौलत धू धू करते हुये जलती नजर आ रही थी ।

( पंकज जोशी ) सर्वाधिकार सुरक्षित ।
16/03/2016
मौलिक व अप्रकाशित
लखनऊ । उ०प्र०

Friday, 11 March 2016

सेंट्रल पार्क

पत्नी के देहांत के पश्चात रवि अपने बेटे के पास अमरीका आकर बस गया था ।अपने पालतू कुत्ते शेडो के साथ घण्टो सेंट्रल पार्क में हाथ में वाइन की बोतल और कैमल सिगरेट पैक से श्वेत दण्डिका निकाल कर सुलगाना यह उसकी दिन चर्या का एक हिस्सा बन चुका था । ऐसे ही उसकी नजर पड़ोस की बैंच पर पड़ी एक प्रौढा युवती पर पड़ी । बोरियत से बचने के लिये उसने उससे दोस्ती गांठने की ठानी ।

" हैलो आई एम् रवि...." जैसे ही उसके यह शब्द जुबां से बाहर निकल पाते तभी वह चिल्लाया " अरे ऋचा तुम ?  पहचाना मुझे मैं रवि उसने अपना परिचय देते हुए कहा "

 " हाँ पहचान लिया कैसे भूल सकती हूँ तुम्हे । " ऋचा बोली

" सिगरेट बुझाते हुए उसने पूछा तुम यहाँ कैसे और कब आईं ? " 
" अरे मेरी लड़की रहती है यहां तो साथ कुछ वक़्त गुजारने चली आती हूँ भारत से " और तुम यहाँ कैसे प्रश्न के साथ ही ऋचा ने कुछ खिसकते हुए बैंच पर उसे बैठने को इशारे से कहा । 
" खांसते हुए उसने एक आह भरी और बोला भला चंगा तुम्हारे सामने हूँ । बेटा मेरा यही बस गया है तो वहां सब कुछ बेच कर .... कहते हुए फिर से खांसने लगा । 

"क्यों पीते हो इतनी जब तुम्हें सूट नहीं करती है । ठण्डी हवा चल रही है , मफलर क्यों नहीं डालते हो गले में " ऋचा ने ठिठोली करते हुए कहा ।

पल भर में उसने ऋचा का हाथ अपने हाथों में लेते हुए कहा । " तुम आज भी मेरा कितना ख्याल रखती हो काश तुम मायके में रहने की जिद ना करती तो आज हम दोनो एक साथ रहते होते । "

"आह काश तुमने मेरे पापा की बात मान ली होती , मैं उनकी इकलौती बेटी थी शानो शौकत से भरी हमारी जवानी गुजरती और बुढापा भी ।" ऋचा ने तंज कसते हुए कहा ।

" तुम आज तक नहीं बदली वही अंदाज जिद्दी , वही अल्लहड़पन " रवि ने हंसते हुये कहा ।

" तुम भी कहाँ बदले हो आज भी मेरा कहना नहीं मानते हो । शाम होने को आई है पर मॉफलर नहीं ओढ़ा तो नहीं ओढ़ा " नहले पे दहला मारते हुए बोली ।

" हाँ चलो चलते हैं शाम होने को आई है , सुनो कल तुम जरा जल्दी आ जाना , जब तक यहाँ हो , तुम्हारा साथ मुझे अच्छा लगता है " रवि ने उसकी ओर मुखातिब होते हुए अपने जवानी के दिनों को याद करते हुये कहा जब दोनों एक साथ पार्क की बैंच पर हाथों में हाथ डाले घण्टो बैठा करते थे ।

" रवि एक बात कहूँ " हाँ हाँ कहो क्या कहना चाहती हो ? बस यही कि क्या हम फिर से एक नहीं हो सकते हैं मेरा मतलब शादी से है । " ऋचा ने मानो जल्दी से अपनी बात कहना चाहा हो ।

" तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है उसने उसके हाथों को प्यार से सहलाते हुए कहा , बुढापे में सठिया गई हो , अब हमारे पोते पोतियों की शादी होने वाली हैं  " 
उसके यह कहते ही हवा में अजीब सा सन्नाटा पसर गया ,
 दोनों की आँखों से बहते हुए आंसुओ के कारण धुंध सी छा गई । दोनों ने अपने अपने चश्मों को पोछते हुए एक स्वर में बोले कल फिर मिलेंगे कहते हुए विपरीत दिशाओं में अपने अपने गंतव्यों की ओर चल दिये ।

( पंकज जोशी ) सर्वाधिकार सुरक्षित ।
लखनऊ । उ०प्र
11/03/2016

Sunday, 28 February 2016

लाल सलाम

" अरे रवि बहुत दिनों बाद दिखे हो ? कहीं बाहर गये थे क्या  ? " कैम्पस में काफी समय बाद मिली उसके बचपन की दोस्त आयशा ने उससे पूछा ।
" अरे कुछ नहीं बस यूं ही घर चला गया था । बड़ी अजीब बात है कल ही मैंने घर फोन किया था तो पता चला कि तुम कई महीनो से घर  गये ही नहीं । अच्छा मेरी अम्मा तुम अभी चलो मुझे क्लास अटेंड करनी है और भी काफी काम है । "
कैंटीन से अपनी किताबें उठाते हुए चलने को हुआ " और यह साथ में तुम्हारे लड़की कौन है ? परिचय नहीं करवाओगे मेरा इससे ? अरे यह तान्या है मेरी क्लास मेट और तान्या यह है आयशा ,खुश चलो चलते हैं । यह तुम बेगानो जैसा क्या सलूक कर रहे हो मेरे साथ , मैं कई दिनों से देख रही हूँ तुम मुझसे कन्नी काट रहे हो , ठीक से बात भी नहीं करते ,यह क्या हुलिया बना रखा है तुमने ? लम्बे बाल , दाढ़ी , फ़टी जीन्स , कुर्ता , यह चप्पल कंधे पर झोला मुँह से कैसी अजीब सी बदबू आ रही है ?  

कैम्पस में लोग ना जाने तुम्हारे बारे में बातें कर रहे हैं , तुम्हे पता भी है ? क्या कहते हैं मेरे बारे में ? रवि ने प्रश्न किया ? यही कि तुम किसी संगठन से जुड़ें हो । तो क्या मैंने कोई अपराध कर लिया ।
देखो मैं तुम्हें कुछ समझाने का प्रयत्न कर रही हूँ कि ....इससे पहले की वह कुछ कहती तभी उसने उसे रोक दिया " देखो मैं अपना भला बुरा भली भांति समझता हूँ , तुम मेरी पैरेंट बनने की कोशिश ना करो । और तुम्हें यह अधिकार दिया किसने कि तुम मेरी इंकायवरी करती फिरो ?

क्या यह भी तुम्हे मुझे बताना होगा कि मैं तुम्हारी कौन हूँ ? चलो बैठो कार में पहले मैं तुम्हारा हुलिया बदलवा दूं फिर किसी अच्छे से रेस्त्रां में बैठ कर ढेर सारी बातें करेंगे । 
तुम पूंजीवादियों की यही समस्या है कि हर समय बात बात पर अपने पैसे की धौंस जमाते रहते हो ।

हैलो ! यह क्या बोल रहे हो हमारे बीच यह सब कहाँ से ? ..... " तभी 
पीछे से आती हुई भीड़ के नारों में उसकी आवाज दब गई और रवि ने तेजी से अपना हाथ आयशा से छुड़ाया और लाल सलाम , लाल सलाम चिल्लाते हुए उसमे खो गया । 

पीछे रह गई तो आँसूओं से डबडबाई उसकी आँखे जिसको अब भी विश्वाश नहीं हो रहा था कि उसके बचपन का प्यार उससे इतनी दूर चला जायेगा । 
( पंकज जोशी ) सर्वाधिकार सुरक्षित।
लखनऊ । उ०प्र०
27/02/2016
मौलिक व अप्रकाशित ।

Wednesday, 6 January 2016

शिकायत का स्पर्श

एक विवाह समारोह में अचानक आकांक्षा की आँखें एक कोने में बैठे विनोद से जा टकराई । ब्लू डेनिम , सफेद शर्ट और ऊपर से हाफ स्लीव सफेद खादी कोट में वह खूब फब रहा था । पहले से कुछ ज्यादा मोटा हो गया था । दूर से खड़ी निहारते हुए उससे रहा नहीं गया उसने वेटर से कोल्ड ड्रिंक का गिलास हाथ में लिया और बढ़ गई उस ओर जहाँ वह बैठा था । " इतने अकेले क्यों बैठे हो विनोद ? तुम तो पार्टियों की जान हुआ करते थे ? आंकाक्षा ने फब्ती कसते हुए कहा । अरे तुम कब आईं , सॉरी ,  मैं कुछ सोच रहा था , तुम्हारी ओर ध्यान ही नहीं गया । " मैं भी तो जानू कि आखिर कौन है वह जिसकी याद में तुम खोये-खोये से रहने लगे हो । अरे तुम तो संजीदा हो गये मैं तो बस यूँ ही मजाक कर रही थी। तुम्हारे बीबी बच्चे किधर हैं वे कहीं दिखाई नहीं दे रहे हैं ।  उनसे मिलवाओगे नहीं ,  मैं इतनी बुरी भी तो नहीं दिखती आज भी .....। " मिलवाता तब जब मेरी शादी हुई होती ।" विनोद ने उत्तर दिया । तो क्या तुम अब तक कुँवारे हो ? " हाँ उसने प्रत्युत्तर दिया " , जवाब देते हुए उसके चेहरे पर स्मित रेखायें खिंच सी आई थी । " अरे तुम अपने परिवार वालों से कब मिलवाओगी ? " विनोद ने हंसते हुए पूछा । " अरे मैने भी अभी तक कहाँ की " अपने भाव-भँगिमा को छुपाते हुए बोली । " क्यों तुमने अब तक शादी क्यों नहीं की ? देखने में सुंदर , बड़ी पढ़ी लिखी खुले विचारों की हो ऊपर से तुम अच्छा ख़ासा कमाती भी हो । तुम्हे तो कोई भी आई ए एस अधिकारी आसानी से  मिल जाता ।" " हाँ मिल तो जाता पर तुम्हारी तरह ना होता उसने गहरी श्वांस भरते हुए कहा। " " अगर तुम्हें मेरी परवाह होती तो मेरे उस खत का जवाब हाँ या ना में जरूर देती ,  मेरी तनख्वाह तुमसे जरूर कम थी पर प्यार नहीं । " विनोद ने उससे नजरे मिलाते हुए कहा ।"  तो क्या यही वजह  रही जो तुमने आज तक .... " पता नहीं शायद हाँ भी या ना भी उसने बेरुखी से गिलास को टेबल पर रखा और  वहां से चला गया । वह पीछे खड़ी उसको बुलाना चाह रही थी पर उसका गला रुंध सा गया था , उसके आँखों के कोरों से बहते आँसू इस बात का प्रतीक थे कि उसकी महत्वाकांक्षा के ऊपर विनोद का शिकायती तंज उसके ह्र्दयतल पर नश्तर सा स्पर्श कर गया था ।

(पंकज जोशी ) सर्वाधिकार सुरक्षित ।
लखनऊ । उ०प्र०
०६/०१/२०१६