Sunday, 30 April 2017

इसी ग्रह का प्राणी

"भाईसाहब, आपको तो खबर मिल ही गई होगी? विवेक ने कुर्सी पर बैठे-बैठे ही संजीव से पूछा।
 "कैसी खबर भाई?"
 "लो, इसका मतलब आप आस्था गए ही नहीं अभी तक?"

"यह आस्था क्या है?" मन ही मन मैं बुदबुदाया, अगर पूछुँगा तो यह सब कमीने मेरी खिल्ली उड़ाएँगे। अपनी भद पिटवाने से अच्छा है चुप बैठूँ!

"अच्छा वहाँ, हाँ भई, अभी नहीं गया, जाना है,साथ चलेंगें.... क्या कहते हो?" उसने प्रत्युत्तर दिया।

मैं सोच में पड़ गया कि थियेटर में कोई नयी पिक्चर आई है या कहीं कोई सेल लगी है? 

तभी बगल में बैठी रीना जी मेरी ओर मुखातिब होते हुए बोली "वहाँ जाकर भी कोई वापस आया है भला कभी?"

मतलब, यह लोग किसी हस्पताल की बात कर रहे हैं! मैं निरामूर्ख शहर में रहते हुए ठीक तरह से हॉस्पिटल के नाम भी नहीं जानता, शायद नया खुला होगा। मैंने अपने आपको समझाते हुए कहा।

तभी मैडम की आवाज कानों में पड़ते ही मेरी तन्द्रा मानो भंग हुई "अरे, कोई इलाज-विलाज नहीं होता है वहाँ, अगर कभी दर्द होता है तो पेनकिलर दे देते हैं। भाईसाहब, बड़े साहब की तनख्वाह कितनी होगी? डेढ़, दो-लाख रुपये तो महीने की होगी ही!"

"आप भी, अरे, इतनी तो कट के उनके हाथ में आती है!" एक सहकर्मी तपाक से बोला।

"लो, और सुनो, मैडम भी तो क्लास वन अधिकारी हैं, इनसे कम तो वह भी नहीं कमाती होंगी, फिर साहब ने अपनी माँ को वृद्धाश्रम में क्यों रखा है? इससे अच्छा तो अपना पानी पिलाने वाला है जो अपने माँ बाप की सेवा घर पर ही कर रहा है!" 

अच्छा तो यह माजरा है सब समझते  हुए मैं कुर्सी के अंदर धँसने लगा। 
"क्या मैं इसी ग्रह का प्राणी हूँ?"

पंकज जोशी
लखनऊ।
(पंकज जोशी) सर्वाधिकार सुरक्षित ।
लखनऊ । उ०प्र०
३०/०४/२०१७

Thursday, 20 April 2017

मात

" साला, हरामखोर ", वह बुदबुदाया  , कौन किसकी बातें कर रहे हो ? पत्नी ने झेंपते हुए चारों ओर अपनी नजरें घुमाते हुए पति से पूछा ।

"अरे और कौन वही - सामने देख उसको , नीली शर्ट ,घुँघराले बाल वाले को - कभी दो वक्त की रोटी के लिये तरसता था आज बैठा है इस महंगे होटल में........."

'हूँ, सुड़प सुड़प चम्मच से सूप पीती हुई अनजान बनते हुए बोली तुम भी क्या , कभी भी कहीं भी शुरू हो जाते हो.......

क्या कभी भी कहीं भी-एक नम्बर का घूसखोर ,  लुच्चा, घटिया इंसान है वो, मक्कारी उसकी रगो में कूट कूट कर भरी हुई है - तुम इतना कुछ उसके बारे   कैसे जानते हो ? " पत्नी ने तुरन्त प्रश्नवाचक चिन्ह उसकी ओर दागा ।

"क्यों ना जानूँगा उसके बारें में मैं , मेरा जूनियर था वो कभी , धंधे की एक एक बारीकियाँ सिखाईं  हैं मैंने उसे ......'

सुड़प सुड़प सूप को पीते हुये वह उससे चुहल के अंदाज में बोली " ऐसा क्यों नहीं कहते कि बाप नम्बरी तो बेटा दस नम्बरी " 

पत्नी के मुँह से ऐसा अप्रत्याशित कथन उसकी कल्पना के परे था , चेहरा गुस्से से लाल हो उठा , अपने थोड़ा सयंमित करते हुये बोला "चलो चलते हैं यहाँ से " कहते हुये उसने अपना पर्स खोला और कुछ हरी पत्तियां मेज पर बिखेर दी ।

जीत के भाव रानी के चेहरे पर साफ़ परिलक्षित थे उसने तुरंत अपनी सीट छोड़ी और रेस्त्रां के बाहर आ खड़ी हुई राजा को आज उसी के खेल में दी पटखनी से उसके सम्पूर्ण मनोरथ सिद्ध हो चुके थे ।

(पंकज जोशी )सर्वाधिकार सुरक्षित
लखनऊ । उ०प्र०
२०/०४/२०१७

Saturday, 15 April 2017

सीख

" मम्मी देखो एक्वेरियम से मछली उछल कर बाहर आ गई है , इसे अंदर डालो नहीं तो यह मर जायेगी।"
पद्म ने अपनी मां का आँचल खींचते हुए कहा ।"बेटा यह मछली अब बड़ी हो गई है और एक्वेरियम इसके लिये छोटा वैसे भी अब यह किसी काम की नही रही...यह बच्चे को तुम क्या उल्टी सीख दे रही हो रीमा ? प्रशांत ने अखबार को मेज पर रखते हुए कहा और क्या सही तो कह रही हूँ बाबू जी मैंने क्या कुछ गलत कहा , आप ही बताइए ?" रीमा ने अपने ससुर की ओर देखते हुये कहा ।
आज उन्हें स्वयं का फ्लैट छोटा प्रतीत हो रहा था वह मौन अपने चश्मे का शीशा साफ़ करने में लगे ।

( पंकज जोशी ) सर्वाधिकार सुरक्षित ।
लखनऊ । उ०प्र०
१५/०४/२०१७