Monday, 8 May 2017

चलें गाँव की ओर

"यह कैसी ज़िंदगी है जहाँ ना खाना पीना ना कपडा लत्ता कुछ भी नसीब नहीं है । गाँव तो हमने अपनी तरक्की के लिये छोड़ा था पर अपना नसीब ही खोटा है रोज सुबह उठ कर बम्बे पर पानी के लिये मारा मारी ,वह नई पड़ोस में जो आई है वह तो इतनी भद्दीभद्दी गाली देती है राम राम ..."
कानों में ऊँगली डालते हुये बोली ।

"अरी भागवान दो कौर रोटी के तो आराम से तो खाने दे , हाय! मैनें कब तुम्हे  खाना खाने से रोका, तुम फैक्टरी चले जाते हो घर पर मैं अकेली रह जाती हूँ अब दिन भर किससे अपने मन की बात कहूँ,एक तुम हो जो वापस आ कर खाना खाते और चुपचाप सो जाते हो बिल्कुल मशीन हो गये हो, अनपढ़ हूँ पर तुमसे ज्यादा जानती हूँ । इससे अच्छा होता कि हम गाँव में ही कोई काम धंधा ढूँढ लेते कम खाते गम खाते पर खुश तो रहते।"

मानो भोलू के मन की बात उसने कह डाली हो , वह शहरी जिंदगी शोषित मजदूरी से तंग आ चुका था खाना खत्म करते हुये वह बोला 'तो क्या कहती हो 'चलें गाँव की ओर'.

(पंकज जोशी)सर्वाधिकार सुरक्षित
लखनऊ ।उ०प्र०
०७/०५/२०१७

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